शनिवार, 28 अक्टूबर 2017

गुरु मंत्र अथवा दीक्षा क्या होती है?

ⓘ Optimized just nowView original http://www.vedicaim.com/2017/07/guru-mantr-deeksha.html?m=1 Vedic Aim Skip to main content वेद, उपनिषद, गीता, भागवत, वेदांत और अन्य ग्रंथों का सार एवम सरल रूप ज्ञान सबको प्रदान करना कविता संख्या के साथ, हमारा परम उद्देश्य हैं। गुरु मंत्र अथवा दीक्षा क्या होती है? महापुरुष को ही गुरु कहते है। गुरु के बारे में जानने के लिए पढ़े ❛गुरु कौन है, अथवा गुरु क्या है?❜ ये जो गुरु लोग कान में मंत्र देते है या गुरु मंत्र देते है या कहों दीक्षा देते है, ये क्या है? यह भगवान का नाम है। जैसे 'रां रामाय नमः", 'क्लीं कृष्णाय नमः', 'नमो भगवते वासुदेवाय नमः', 'श्री कृष्ण शरणम ममः' आदि। यह सब गुरुओं के मंत्र है। इन सबका एक ही मतलब, 'हे भगवान आपको नमस्कार है।" अथवा 'हे भगवान मैं आपकी शरण में हूँ।' यही मंत्र का जाप शिष्य करता है। अतएव प्रश्न यह उठता है कि, 'अगर हम हिंदी, अंग्रेजी, बंगाली आदि भाषाओं में कहेंगे तो क्या भगवान नहीं सुने गए। भगवान भी भाषा वादी है क्या, संस्कृत में बोलेंगे तब मैं (भगवान) सुनुगा?' नहीं! वो तो "भावग्राही जनार्दन" है। भगवान भावना (प्रेम) देखते है। इसलिए यह जो गुरु मंत्र अथवा दीक्षा है, यह केवल संस्कृत में बोलना या लेने वाली बात गलत है। आपलोग अपने गुरु से पूछे ये क्या दे रहे है, गुरु मंत्र अथवा दीक्षा? गुरु: मंत्र आप: कैसा मंत्र। गुरु: भगवान का नाम। आप: भगवान का नाम तो भारत के सब लोग जानते है। यहाँ पर तो मरने के बाद नारा लगता है, 'राम नाम सत्य है।' यह सबको पता है, फिर आप मेरे कान में क्या दे रहे है। गुरु: देखों इस मंत्र में अलौकिक शक्ति है। यह हमरे गुरु जी के गुरु जी के गुरु जी का है। आप: तो वो जो अलौकिक शक्ति आपके बातये नाम में है। क्या वो अलौकिक शक्ति राम श्याम में नहीं है? अगर आपके द्वारा दियेगये कान के मंत्र को न जपते हुए, हम 'हरे राम हरे राम' जपे 'गोविन्द जय जय गोपाल जय जय' बोले तो क्या उसमें वो अलौकिक शक्ति नहीं है। अब गुरु जी को चुप रहना पड़ेगा। क्योंकि शास्त्र वेद कहते है कि, "नाम्नामकारि बहुधा निज सर्वशक्तिसुतखार्पिला नियमित: स्मरणे न काल:" अर्थात प्रत्येक भगवन नाम में भगवान स्वयं बैठे है और उनकी प्रत्येक (सभी) शक्तियाँ निहित (बैठी) है। अस्तु, अगर गुरु जी फिर भी कहे: और सभी भगवन नाम में शक्तियां नहीं होती जो गुरु के दिए हुए नाम में होती है। आप: ठीक है, गुरु जी आप दीजिये हमारे कान में मंत्र। और अगर हमारे कान में दिए हुए मंत्र का प्रभाव तुरंत नहीं हुआ। तो फिर १० चप्पल लगाएंगे आप पर। आपको यह बात सिद्ध करना पड़ेगा कि, 'आपके गुरु के गुरु के गुरु द्वारा दिए गए भगवन नाम अलौकिक शक्ति है, जैसे ही तुम्हारे कान में पड़ेगा वैसे ही उस अलौकिक शक्तियों का अनुभव होगा।' अब गुरू जी या तो भाग जाएंगे या तो आपसे क्षमा मगे गए। अतएव ये लोग गुरु नहीं है, ये पाखंडी है। अब समझिये यह गुरु मंत्र अथवा दीक्षा क्या है। यह दीक्षा को कोई अलौकिक शक्ति कहता है, तो कोई दिव्य आनंद और कोई दिव्य प्रेम आनंद कहता है। यदपि यह सब एक ही है। दीक्षा देना का मतलब अलौकिक शक्ति देना भी है, दिव्य प्रेम देना भी है और दिव्य आनंद देना भी है। तो अब प्रश्न है कि, 'दीक्षा कब मिलती है?' इस प्रश्न के उत्तर के लिए पढ़े ❛गुरु मंत्र अथवा दीक्षा कब मिलती है?❜ अवश्य पढ़े ❛क्या करे अगर हमारा गुरु वास्तविक गुरु नहीं है।❜ कर्म काण्ड गुरु ज्ञान काण्ड भक्ति / उपासना काण्ड You Might Also Like सामवेद यह गेय ग्रन्थ है। इसमें गान विद्या का भण्डार है, यह भारतीय संगीत का मूल है। ऋचाओं के गायन को ही साम कहते हैं। इसकी १००१ शाखाएं थीं। परन्तु आजकल तीन ही प्रचलित हैं - कोथुमीय, जैमिनीय और राणायनीय। इसको पूर्वार्चिक और उत्तरार्चिक में बांटा गया है। पूर्वार्चिक में चार काण्ड हैं - आग्नेय काण्ड, ऐन्द्र काण्ड, पवमान काण्ड और आरण्य काण्ड। चारों काण्डों में कुल ६४० मंत्र हैं। फिर महानाम्न्यार्चिक के १० मंत्र हैं। इस प्रकार पूर्वार्चिक में कुल ६५० मंत्र हैं। छः प्रपाठक हैं। उत्तरार्चिक को २१ अध्यायों में बांटा गया। नौ प्रपाठक हैं। इसमें कुल १२२५ मंत्र हैं। इस प्रकार सामवेद में कुल १८७५ मंत्र हैं। इसमें अधिकतर मंत्र ❛ऋग्वेद❜ से लिए गए हैं। इसे उपासना का प्रवर्तक भी कहा जा सकता है। प्राचीन आर्यों द्वारा साम-गान किया जाता था। सामवेद चारों वेदों में आकार की दृष्टि से सबसे छोटा है और इसके १८७५ मन्त्रों में से ६९ को छोड़ कर सभी ऋगवेद के हैं। केवल १७ मन्त्र अथर्ववेद और यजुर्वेद के पाये जाते हैं। फ़िर भी इसकी प्रतिष्ठा सर्वाधिक है, जिसका एक कारण गीता में कृष्ण द्वारा वेदानां सामवेदोऽस्मि कहना भी है।… … KEEP READING मनुष्य कितने दुखों से पीड़ित है? सबसे बड़ा दुःख? वेद में ताप को दुःख भी कहा जाता है। विश्व का प्रतेक जीव (व्यक्ति) दुखी है। तीन प्रकार के तापो (दुखों) से तप रहा है। आध्यात्मिक (दैहिक), आधिभौतिक (भौतिक) और आधिदैविक (दैविक) केवल यह तीन प्रकार के ताप (दु:ख) हैं संसार के सभी जीवों (मनुष्यों) को। यही ताप प्रेरक छण और प्रेरक जीवों (माया के अधीन मनुष्य) को दुःखमय बनाये हुए हैं। इन तीनों में सबसे प्रमुख है आध्यात्मिक ताप जिसे दैहिक दुःख भी कहते है। आध्यात्मिक (दैहिक) आध्यात्मिक दुःख भी दो प्रकर का होता है:- १. शारीरक और २. मानसिक। इन दोनों में मानसिक ताप (दुख) सबसे बड़ा दुखदाई है। १.शारीरक ताप जो शरीर की रोग है, यह शारीरक ताप (दुःख) कहलाती है। आप जानते ही है। आज बुखार है, तो कलअतिसार (डायरिया) है, आज ब्लड प्रेशर बढ़ गया तो कल डाइबटीज हो गया। इतनी जटिल शरीर की बनावट है की कोई न कोई भाग गड़बड़ रहता ही है। फिर मनुष्य भी असावधान है विषयों का लोलुप (लालची) है, कोईसंयम से आहार विहार व्यवहार नहीं रहता। इसलिए सदा प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी रोग से ग्रस्त (पीड़ित) हैं। और अगर मान लो कोई करोड़ों में कोई एक ऐसा व्यक्ति भी हो। तो मानसिक रोग से तो सब के … … KEEP READING आयुर्वेद आयुर्वेद (आयुः + वेद = आयुर्वेद) विश्व की प्राचीनतम चिकित्सा प्रणालियों में से एक है। यह ऋग्वेद का उपवेद है। यह विज्ञान, कला और दर्शन का मिश्रण है। ‘आयुर्वेद’ नाम का अर्थ है, ‘जीवन का ज्ञान’ और यही संक्षेप में आयुर्वेद का सार है। हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम्। मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते॥ -(चरक संहिता १/४०) (अर्थात जिस ग्रंथ में - हित आयु (जीवन के अनुकूल), अहित आयु' (जीवन के प्रतिकूल), सुख आयु (स्वस्थ जीवन), एवं दुःखआयु (रोग अवस्था) - इनका वर्णन हो उसे आयुर्वेद कहते हैं।) आयुर्वेद और आयुर्विज्ञान दोनों ही चिकित्साशास्त्र हैं परन्तु व्यवहार में चिकित्साशास्त्र के प्राचीन भारतीय ढंग को आयुर्वेद कहते हैं और ऐलोपैथिक प्रणाली (जनता की भाषा में 'डाक्टरी') को आयुर्विज्ञान का नाम दिया जाता है। आयुर्वेद का परिभाषा एवं व्याख्या आयुर्वेद विश्व में विद्यमान वह साहित्य है, जिसके अध्ययन पश्चात हम अपने ही जीवन शैली का विश्लेषण कर सकते है। (1) आयुर्वेदयति बोधयति इति आयुर्वेदः। अर्थात जो शास्त्र (विज्ञान) आयु (जीवन) का ज्ञान कराता है उसे आयुर्वेद कहते हैं। (2) स्वस्थ… … KEEP READING क्या राम और कृष्ण एक ही हैं? भगवान के अवतारों में भेद-भाव करना ये ❛नामापराध❜ हैं। और ❛नामापराध❜ से बड़ा कोई पाप नहीं हुआ करता। भगवान के जितने भी अवतार है उनमे भेद-भाव करना अपराध हैं। भगवान के किसी भी अवतार में भेद बुद्धि नहीं लगनी चाहिए और खास तोर से राम-कृष्ण अवतार में। और सभी अवतार में तो शरीर का अंतर हैं, देखने मे! जैसे नरसिंह अवतार, वराह अवतार, मत्स्य अवतार। लेकिन! राम कृष्ण में तो शरीर में भी भेद नहीं हैं। अध्यात्म रामायण में ब्रह्मा ने कहा था "मायातीतं माधवमाद्यं जगदािदं"हे राम तुम माया तित(माया से परे), मायाधीश हो और तुम माधव हो। ब्रह्मा माधव कह रहे है। अरे ब्रह्मा जी! आप की बुद्धि ख़राब है क्या? ब्रह्मा जी ये तो राघव है, माधव तो द्वापर में अवतार लेके आये थे। फिर ब्रह्मा बोले अध्यात्म रामायण "वन्दे रामं मरकतवर्णं"हे राम, मै आपको प्रणाम करता हूँ, जो मरकतवर्णं के आप हैं। मरकतवर्णं अर्थः मथुरा के धीश। अब सोचों मथुरा से क्या मतलब है राम का? राम तो मथुरा गये ही नहीं, रामाअवतार में। और ये भी सुनो अध्यात्म रामायण "वृन्दारण्ये वन्दितवृन्दारकवृन्दं" वृंदावन में रहने वाले मेरे राम। ध्… … KEEP READING वेद का विभाजन वेद के चार भाग क्यों हुआ ऋषि कृष्ण द्वैपायन भगवान के अवतार है। श्रीकृष्ण का जन्म द्वापर में हुआ और ऋषि कृष्ण द्वैपायन जी भी द्वापर में हुए इन्हे आज वेदव्यास जी के नाम से जाना जाता है। द्वापर युग के अंत में जब कलियुग का प्रारम्भ हो रहा था, तब एक समस्या उत्पन्य होने लगी। क्योंकि वेद एक था और पहले एक वेद के सम्पूर्ण ज्ञान को एक व्यक्ति याद रख लेता था परन्तु कलियुग के मनुष्य को सम्पूर्ण वेद का ज्ञान याद करना संभव नहीं था। इसलिए उस वक के ऋषि मुनियों ने वेद के विभाजन करने की इच्छा की। परन्तु वेद का विभाजन करना इतना सरल नहीं हैं। फिर वेद का विभाजन कौन करें, तो फिर वेदव्यास जी को चुना गया। क्योंकि वेदव्यास जी के बुद्धि की तुलना उस वक्त कोई और नहीं कर सकता था। और वेदव्यास वेद के दो विरोधी मंत्रो का समाधान करते थे। इसलिए ऋषि कृष्ण द्वैपायन अर्थात वेदव्यास जी ने उस समय के ऋषिओं के आज्ञा से वेद का चार भाग किया। वेद के चार भाग हैं यह वेद चार भागों में विभाजित हुए १. ❛ऋग्वेद❜ २.यजुर्वेद ३. ❛सामवेद❜ ४. ❛अथर्ववेद❜ सृष्टि के प्रारंभ में वेद अविभक्त तथा एक लाख मंत्र वाला था। अठाइसवें द्वापर में वेदव्य… … KEEP READING धर्म क्या है? धर्म के प्रकार? परधर्म व अपरधर्म क्या है? धर्म का अर्थ होता है "धारण करना" या "धारण करने योग" वेदों में दो प्रकार के धर्मों का वर्णन हैं, १.परधर्म २.अपरधर्म। अपरधर्म माने "वर्णाश्रम धर्म"  वर्णा माने, "ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र", और आश्रम मने, "ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास यह चार आश्रम हैं।"  जैसे ब्राह्मण क्या करे क्या ना करे, उसके बारे में वेदों में बहुत कुछ विस्तार से लिखा है, जैसे ब्राह्मण ब्रह्मचर्य में क्या करे क्या ना करे, फिर गृहस्थ में क्या करे क्या न करे, वानप्रस्थ और संन्यास  में क्या करे क्या न करे, वैसे ही क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र केलिए भी लिखा हैं। वेदों में वर्णाश्रम धर्म का बड़ा लंबा -चौड़ा उलेख है, अगर इस जन्म में कोई पढ़े और पालन करे, तो वो असंभव बात है। परधर्म का अर्थ संक्षेप में होता है भगवान(श्री कृष्ण, राम, संकर आदि) की भक्ति। लेकिन परधर्म में कामना नहीं होती, यानि "हेतु के बिना" अर्थात अहेतुकी जो भक्ति होती है, वो परधर्म है। तोपरधर्म मतलब भगवान(श्री कृष्ण, राम, संकर आदि) उनका नाम, उनका रूप, उनकी लीला, उनके गुण, उनके धाम, उनके … … KEEP READING यजुर्वेद यजुर्वेद हिन्दू धर्म का एक महत्त्वपूर्ण श्रुति धर्मग्रन्थ और चार वेदों में से एक है। इसमें यज्ञ की असल प्रक्रिया के लिये गद्य और पद्य मन्त्र हैं। ये हिन्दू धर्म के चार पवित्रतम प्रमुख ग्रन्थों में से एक है और अक्सर ऋग्वेद के बाद दूसरा वेद माना जाता है - इसमें ऋग्वेद के ६६३ मंत्र पाए जाते हैं। फिर भी इसे ऋग्वेद से अलग माना जाता है क्योंकि यजुर्वेद मुख्य रूप से एक गद्यात्मक ग्रन्थ है। यज्ञ में कहे जाने वाले गद्यात्मक मन्त्रों को ‘'यजुस’' कहा जाता है। यजुर्वेद के पद्यात्मक मन्त्र ॠग्वेद या अथर्ववेद से लिये गये है। इनमें स्वतन्त्र पद्यात्मक मन्त्र बहुत कम हैं। यजुर्वेद में दो शाखा हैं : दक्षिण भारत में प्रचलित कृष्ण यजुर्वेद और उत्तर भारत में प्रचलित शुक्ल यजुर्वेद शाखा। नाम और विषय यजुस के नाम पर ही वेद का नाम यजुस+वेद(=यजुर्वेद) शब्दों की संधि से बना है। यज् का अर्थ समर्पण से होता है। पदार्थ (जैसे ईंधन, घी, आदि), कर्म (सेवा, तर्पण ), श्राद्ध, योग, इंद्रिय निग्रह। इत्यादि के हवन को यजन यानि समर्पण की क्रिया कहा गया है। इस वेद में अधिकांशतः यज्ञों और हवनों के नियम और विधान हैं, … … KEEP READING भगवान से हमारा (जीव या आत्मा का) चार सम्बन्ध है। गीता ९.१८ "गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्।" अर्थात भगवान हमारे सबकुछ है। "त्वमेव माता च पिता त्वमेव...त्वमेव सर्वम् मम देव देव ॥" अर्थात भगवान ही हमारे सब कुछ है। सम्बन्ध का अर्थ, भगवान या संसार कौन हमारा सम्बन्धी है? इस लेख में हमने बताया कि हमारा सम्बन्ध केवल भगवान से ही है। भगवान से हमारा चार सम्बन्ध १. साजात्य सम्बन्ध … KEEP READING Terms Of Services Privacy Policy Disclaimer Copyright © 2016-17 Vedicaim.com All rights reserved

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