शनिवार, 28 अक्टूबर 2017

एकै साधे सब सधै

अपना ब्लॉग Log In Search for: अपना ब्लॉग रजिस्टर करें मौजूदा ब्लॉगर्स लॉग-इन करें एकै साधे सब सधै! February 17, 2016, 1:00 PM IST करुणा निधि ओझा in तार्किक सोच | देश-दुनिया आज हमारा देश अनेक समस्याओं से जूझ रहा है घरेलू समस्याओ के साथ ही बाहरी ताकतों का आन्तरिक मामलो  में हस्तक्षेप विकास में बाधक बना हुआ है .जहाँ एक तरफ भारत विश्व पटल पर अपनी सशक्त उपस्थित के लिए संघर्ष कर रहा है और हर क्षेत्र में कामयाबी  के बुलंदी पर अपने आप को खड़ा  हुआ देखना चाहता है वहीं दूसरी ओर उसे आतंक जैसी बड़ी चुनौती से दो चार होना पड़ रहा है यह देश का दुर्भाग्य ही है की कुछ आन्तरिक शरारती तत्व अपने कृत्यों तथा बयानों से आग में घी डालने का काम भी कर रहे है ऐसे माहौल तथा परिस्थिति में देश को हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना तथा विकास के नये कीर्तिमान स्थापित करना सबसे बड़ी चुनौती है।   पडोसी देशो के साथ  विशेषकर पाकिस्तान के साथ शांति तथा दोस्ताना माहौल बनाने के लिए भारत अनेक कुटनीतिक व राजनीतिक प्रयास कर रहा है किन्तु अभी तक अपेक्षित कामयाबी नही मिली ..कभी कभी चीन भी  दबंगई दिखाने से बाज नही आता है और देशो का क्या कहना.. ऐसे अनेक चुनौती तथा समस्या देश के समक्ष खड़ी है जैसे शरीर के कमजोर होने पर नाना प्रकार की बीमारी का होना ..और शरीर के हृष्ट पुष्ट होने पर सभी बीमारीयों का लोप हो जाना ..ठीक यही नियम किसी व्यक्ति संस्था तथा देश पर भी समान रूप से लागूं होता है ।   इसी परिप्रेक्ष्य में महान चिंतक दार्शनिक तथा भविष्य द्रष्टा रहीम जी का यह कथन उल्लेखनीय है कि… एकै साधे सब सधे सब साधे सब जाय ..रहिमन सीचे मूल को फुलही फलही अघाय ………….अपने देश के लिए यह कथन बहुत ही प्रासंगिक है बस एक मूल  लक्ष्य.. अपने आप को सामरिक और आर्थिक ढंग से इतना मजबूत बना लिया जाय की किसी देश की  आंख दिखाने की  हिम्मत न पड़े …जब भारत भी चीन अमेरिका की तरह सामरिक दृष्टि से मजबूत हो जायेगा तो पाकिस्तान क्या किसी देश की हिम्मत आन्तरिक मामलो में दखल देने की नही होगी …डाल पत्तो को सीचने के बजाय जड़ में पानी दो अर्थात् हाथ जोड़ने शांति की भीख मागने के बजाय अपने आप को मजबूत से मजबूत बनाओ सारी समस्या का समाधान स्वयं हो जायेगा ..सभी आप से सौहार्द्रपूर्ण सबंध रखने को मजबूर होगे ..आतंक का आंतक भी मिट जायेगा तब आप दूसरो की दिशा व दशा तय करने लगेगे देश सम्मान तथा देश स्वाभिमान को कोई डिगा नही पायेगा और तब आप शिखर पर होगे जहाँ से सहज ही आप सब पर नजर रख सकेगे और आप पर नजर रखने के लिए जब कोई सर उठाएगा तो उसकी गर्दन स्वतः मोच खा सकती है उसकी आँखों में छोटा तिनका गिरने से भी उसकी आंखे बंद हो जायेगी इसलिए हे भारत के अधिनायक व भाग्य बिधाता आपसे देश की जनता का यही आग्रह है की आप भारत को भी  चीन और अमेरिका की तरह सैन्य ताकत में इतना मजबूत बना दो की कोई नापाक नजर डालने की हिम्मत न जुटा सके।   तब न तो कश्मीर न तो  JNU की समस्या और न ही कोई अन्य देश बिरोधी गतिविधियों का भय रहेगा .हो सकता है तब शांति वार्ता के प्रयासों का सार्थक  नतीजा भी निकले .और देश में अमन चैन स्थापित हो जाय ..और ये सब संभव है अपने सरकार….  राजनेताओ…राजनयिकों के अदम्य साहस एवं क्रांतिकारी सोच से। डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं लेखक करुणा निधि ओझा पेशे से ह्म अध्यापन का कार्य करते है मुख्यत तर्कशास्त्र का शिक्षण. . . और FROM WEB Reach premium banking & finance audiences. COLOMBIA Burn upto 20 kgs with this easy method. Nutralyfe Watch Simran, an Indian heist comedy movie Prime Video FROM NAVBHARAT TIMES मल्लिका ने अक्षय से पूछा- अपनी बेटी से भी ऐसा मजाक करते? NAVBHARATTIMES कार्यक्रम में अचानक पिता से मिले सीएम योगी, आंखें हुईं नम NAVBHARATTIMES वाइंस्टीन पर एक और ऐक्ट्रेस ने लगाया रेप का आरोप NAVBHARATTIMES FROM WEB Help save this Farmer's 11-month-old Baby! Milaap HDFC Life Click2Protect 3D Plus offers 9 plan options HDFC Life Insurance Daddy, story of a gangster-turned-politician Prime Video Effective natural treatment consult at 250 Dr Batra's Help my 3-year-old daughter Stay Alive! Milaap FROM NAVBHARAT TIMES बेंगलुरु: पुजारी के बेटे का सेक्स विडियो लीक, प्रदर्शन NAVBHARATTIMES तेल का खेल खत्म, सऊदी अरब का यह है आगे का प्लान NAVBHARATTIMES राष्ट्रपति कोविंद ने सुधारी गलती, देवेगौड़ा को किया फोन NAVBHARATTIMES सिर्फ पैर दिखाकर यह मॉडल कमाती है ₹5 करोड़ NAVBHARATTIMES बिहार: ससुराल में पति की हत्या, पत्नी पर आरोप NAVBHARATTIMES 1 COMMENTS अपना कॉमेंट लिखे Dilmani Ram Sharma•Unknown•1 year ago ---खुद को साध लिया समझो सब साध लिया ! 0 0 •जवाब दें•शिकायत करें सबसे चर्चित पोस्ट सुपरहिट पोस्ट 1. अशरात-ए-दीपक 2. क्या राहुल गांधी को लेकर बीजेपी का डर जायज है? 3. फील्डमार्शल जनरल रोमेल – भाग 20 4. सुधार हो या विकास, चाहो तो हो सकता है 5. इंसानियत - एक धर्म ( भाग - 41 ) टॉपिक से खोजें नेता कार्टून सरकार सिरसा दुरूपयोग ब्लाग देश नियम व्यंग्य चुनाव भारत अधिकार इस्लाम कविता उपयोग कांग्रेस समाज -अधिकार कर्तव्य सुरक्षा मोनिका-गुप्ता हरियाणा सुधार मोदी अराजकता नए लेखक और » FROM WEB Believe in reincarnation? Watch Raabta online Prime Video Improve your vigor,vitality & stamina.Govt approved. 45%off ZEEAYURVEDA Turn daily trading to daily profits iforex.in A Lakshman Rekha won’t protect your home? Bajaj Allianz हमें Like करें Copyright ©  2017  Bennett Coleman & Co. Ltd. All rights reserved. For reprint rights: Times Syndication Service

एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय

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TAGSRahim ke doheRahim ke dohe in hindi RELATED ARTICLESMORE FROM AUTHOR पाठकों के लेख स्वादिष्ट भोजन में कंकड़ की तरह है कर्नाटक का हिंदी विरोध – तारकेश कुमार ओझा खबरों में महाबलेश्वर सैल को ‘सरस्वती सम्मान’ कविताएँ लोग मिलते हैं बदलते हुए मौसम की तरह साहित्य छिमा बड़ेन को चाहिए, छोटन को उतपात Rahim ke dohe साहित्य बिपति भए धन ना रहे, होय जो लाख करोर – Rahim Ke Dohe साहित्य करम हीन रहिमन लखो, धंसे बड़े घर चोर – Rahim Ke Dohe अभी अभी यूपी निकाय चुनाव: 3 चरणों में होंगे मतदान,1 दिसंबर को आएंगे रिजल्ट उत्तरप्रदेश Parveen Arshi - 2017-10-28 0 अरुणिमा के संघर्ष भरे दौर और एवरेस्ट फतह की कहानी जल्द फ़िल्मी पर्दे... खबरों में Parveen Arshi - 2017-10-27 0 ताजमहल के नीचे बंद दरवाज़ों का सच क्या हैं .. खबरों में Parveen Arshi - 2017-10-26 0 शरीर के लिए कैल्शियम कितना ज़रूरी है. घरेलु नुस्खे Parveen Arshi - 2017-10-26 0 मोहब्बत की निशानी ताज मे… योगी उत्तरप्रदेश Parveen Arshi - 2017-10-26 0 संपर्क हमसे जुड़ें हिन्दीवार्ता टीम © 2017 HindiVarta.com

एकै साधे सब सधै ,सब साधे सब जाय , रहिमन मूलहिं सींचिबो ,फ़ुलै फ़लै अगाय।

कबीरा खडा़ बाज़ार में The Blog By KANISHKA KASHYAP.It Speaks in volume against West sponsored Cultural Infiltration. search OCT 18 एकै साधे सब सधै ,सब साधे सब जाय , रहिमन मूलहिं सींचिबो ,फ़ुलै फ़लै अगाय। अब्दुल अब्दुल रहीम -ए -  खानेखाना चाह गई चिंता मिटी ,मनवा बे -परवाह , जिनको कछु न चाहिए ,वे साहन के साह।  रहीम जी कहते हैं : अगर मनुष्य के मन से इच्छा समाप्त हो जाए तो उसकी सब चिंताएं मिट जातीं हैं । जिनको कुछ नहीं चाहिए वे सब राजाओं के राजा हैं क्योंकि वे हर हाल में खुश रहते हैं। कहने का तात्पर्य है कि हमारी चिंताएं ,हमारी इच्छाओं के कारण ही बढ़ती  जाती हैं अत :हमें अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए।  जो रहीम उत्तम प्रकृति ,का करी सकत कुसंग , चन्दन विष व्यापत नहीं ,लिपटे रहत भुजंग।  रहीम कहते हैं कि जो लोग अच्छी प्रकृति के होते हैं  बुरा साथ भी उनका कुछ नहीं कर सकता। जैसे चन्दन के पेड़ पर सांप लिपटे रहते हैं फिर भी चन्दन में  जहर नहीं होता कहने का तात्पर्य है कि हमें अपने चरित्र को इतना बलवान बनाना चाहिए कि उस पर किसी भी बाहरी ताकत का प्रभाव न पड़ सके ।  रहिमन पानी राखिये ,बिन पानी सब सून , पानी गए न ऊबरे ,मोती मानुष चून।  रहीम कहते हैं कि पानी के बिना सब सूना है। पानी के बिना मोती अर्थात संपत्ति मनुष्य और चूना अर्थात धरती सब बेकार हैं। कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य का चरित्र पानी की तरह होना चाहिए क्योंकि पानी जीवन में सबसे मह्त्वपूर्ण वस्तु होती है।पानी के बिना सब बेकार होता है।  कही रहीम सम्पति  सगे ,बनत बहुत बहु रीत ,  बिपति कसौटी जे कसे ,तेई सांचे मीत।  रहीम कहते हैं कि संपत्ति होने पर तो सब ही आपके  सगे सम्बन्धी और  मित्र बनते  हैं ,उनकी कसौटी मुसीबत के क्षणों  में ही होती है। जो हर प्रकार की मुसीबत में आपका साथ निभाते हैं और आपका साथ नहीं छोड़ते वही सच्चे मित्र  कहलाते हैं। जाल परे जल जाती बहि  ,तज मीनन को मोह , रहिमन मछली नीर को ,तऊ न छाँडति  मोह  .  पानी व मछली से भरे तालाब में जाल फैंकने   से पानी तो मछली को छोड़कर जाल से बाहर निकल जाता है परन्तु मछली पानी के मोह में अपने प्राणों को त्याग देती है।  तरुवर फल नहीं खात है ,सरवर पियत न पान , कहि रहीम परकाज हित ,सम्पति -सचहिं सुजान।  रहीम कहते हैं वृक्ष अपने फलों को स्वयं नहीं खाते हैं ,न ही तालाब अपना पानी स्वयं पीते हैं ,ये तो दूसरों की भूख व प्यास मिटाते हैं। इसलिए मनुष्य को चाहिए कि संपत्ति का संचयन अपने लिए न करके दूसरों की सहायता के लिए करना चाहिए। सन्देश है पेड़ और सरोवरों की तरह परोपकारी बनो।  थोथे बादर क्वार के ,जो रहीम घहरात , धनी पुरुष निर्धन भये ,करें पाछिली  बात। रहीम कहते हैं कि वही बादल गरजते हैं जो बारिश नहीं करते (जो गरजते हैं वे बरसते नहीं )परन्तु उनकी गर्जना से यही आभास होता है कि ये बारिश अवश्य करेंगे। उसी प्रकार धनी  व्यक्ति गरीब हो जाने पर  बीते समय की डींगें हांकते रहते हैं ,मानो अब भी उनका वही समय चल रहा है।थोथा चना बाजे घना।  धरती की -सी रीत है ,सीत ,घाम औ मेह  , जैसी परे सो सही रहे ,त्यों रहीम यह देह।  जिस तरह धरती गर्मी -सर्दी और बरसात की मार को अपनी देह में सह जाती है ,उसी प्रकार मनुष्य का वही शरीर ,शरीर कहलाता है जो विपत्ति को सह जाता है।  एकै साधे सब सधै ,सब साधे  सब जाय , रहिमन मूलहिं सींचिबो ,फ़ुलै फ़लै अगाय।  प्रस्तुत  दोहे में रहीम ने मनुष्य की ईश्वर के प्रति भक्ति भाव को अभिव्यक्त  किया हैकि यदि मनुष्य एक ही ईश्वर अर्थात परब्रह्म की उपासना करे तो उसके सभी मनोरथ पूरे हो सकते हैं। यदि वह अपने आपको और अपने मन को स्थिर न रखते हुए कभी किसी देवी - देवता और कंभी किसी और देवी -देवता को पूजेगा तो उसकी मनोकामना कभी भी पूरी नहीं हो पायेगी।वह सदा दुखी ही रहेगा और इस तरह उसका कल्याण भी नहीं हो पायेगा।  यह सब उसी प्रकार है जैसे कोई माली किसी पेड़ की जड़ को सींचता है तो वह पेड़ फलता फूलता है। लेकिन यदि माली पेड़ की जड़ के स्थान पर उसकी पत्तियाँ ,डाल -डालियों (शाखाओं ),फूलों की पंखुड़ी आदि को ही अलग -अलग सींचता रहेगा  तो एक दिन वह पेड़ ही नष्ट हो जाएगा। कहने का तात्पर्य  यहाँ यह है कि हमें सदैव मूल को ही सींचना चाहिए तभी सही फल की  प्राप्ति होगी। रहिमन वे नर मर चुके जे कछु  मांगन जाहिँ , उनते पहले वे मुए ,जिन मुख निकसत नाहिं।  रहीम इस दोहे के मार्फ़त हमें कह रहें हैं कि वे लोग जो किसी से कुछ मांगने जाते हैं ,वे मरे हुए के समान ही हैं,(मांगन मरण समान )लेकिन मांगने वाले व्यक्ति से भी पहले वे लोग मर चुकें हैं जिनके मुख से याचक को देने के लिए कुछ नहीं निकलता। अर्थात मांगना तो बुरी बात है ही लेकिन उससे भी बुरी बात तो यह है कि कोई आपसे कोई  कुछ मांग  रहा है और आप उसे दुत्कार के भगा देते हो। वे लोग तो उस व्यक्ति से पहले ही मर चुके होते हैं जिनके मुख से ना  निकलती है।   जो रहीम गति दीप की ,कुल सपूत गति सोय, बारे उजियारो करै ,बढ़े अंधेरो होय।  इस दोहे के माध्यम से रहीम हमें दीपक और सुपुत्रों  की जानकारी दे रहे हैं। रहीम कहते हैं कि दीपक और सुपुत्रों की स्थिति एक सामान होती है। जब दीपक जलता है तो उसके जलने से चारों तरफ प्रकाश ही प्रकाश फ़ैल जाता है। और जब बुझ जाता है तो चारों तरफ अन्धेरा छा जाता है। ठीक उसी प्रकार जिस घर में सुपुत्र होता है उसकी कीर्ति और यश चारों और फैलता है और जब सुपुत्र उस घर या कुल से चला जाता है तो वह घर फिर सूना सूना हो जाता है। दीपक और सुपुत्र अपने कार्यों से संसार में  चारों तरफ अपनी कीर्ति स्थापित करते हैं।  जे गरीब सों हित करें ,ते रहीम बड़ लोग , कहा सुदामा बापुरो ,कृष्ण मिताई जोग।    रहीम  ने इस दोहे के माध्यम से हमें बड़े और महान लोगों के बारे में बताने का प्रयास किया है। रहीम कहते हैं कि जो व्यक्ति गरीबों के हितों का ख्याल रखता है उसकी हर समय सहायता करता है वही महान या बड़ा होता है। जो व्यक्ति अपना ही भला  सोचते हैं ,ऐसे लोग स्वार्थी होते हैं।  ऐसे लोग कभी भी किसी का भला नही कर सकते।ये तो सदैव अपने स्वार्थों की सिद्धि में ही विरत रहतें हैं और किसी के लाभ का कुछ सोचते ही नहीं।  यहाँ पर रहीम कृष्ण और सुदामा का उदाहरण देकर बताते हैं कि सुदामा एक गरीब ब्राह्मण ही था उसके पास कोई धन -दौलत नहीं  थी  जबकि श्री कृष्ण द्वारिका के  राजा थे ,वे तो सदा से ही वैभवशाली थे। दोनों की मित्रता विधार्थी जीवन में ही गुरु संदीपन के यहाँ हुई थी। दोनों ने साथ -साथ शिक्षा ग्रहण की थी। दोनों में घनिष्ट मित्रता थी। श्री कृष्ण ने अपने मित्र सुदामा की सहायता कर उसे भी ऐश्वर्य प्रदान कर अपने जैसा बना लिया था। इसीलिए तो श्रीकृष्ण आज भी महान और पूजनीय  हैं ।दोनों की मित्रता के  गुणगान आज भी बड़े आदर से किये जाते हैं।  टूटे सुजन मनाइए जो टूटे सौ बार , रहिमन फिरि -फिरि , पोहिए  ,टूटे मुक्ताहार।   रहीम यहाँ प्रियजनों -सुजनों के महत्व को बता रहे हैं। रहीम कहते हैं जो भी हमारा प्रियजन (सज्जन पुरुष )हमसे रूठ जाए तो उसे मना लेना चाहिए। भले हमें उसे सौ बार ही क्यों न मनाना पड़े ,प्रियजन को हमेशा ही मना लेना चाहिए। रहीम प्रियजनों की तुलना मोतियों से करते हुए कहते हैं जिसप्रकार सच्चे मोतियों की माला के बार बार टूटने पर भी हर बार मोतियों को पिरोकर हार बना लिया जाता है। यहाँ कहने का तात्पर्य यह है कि व्यक्ति की शोभा उसके प्रियजनों से ही होती है। जिस प्रकार हार गले में पहनने  के बाद ही सुशोभित होता है।  Posted 18th October 2013 by Virendra Kumar Sharma 0 Add a comment Loading

दीक्षा और गुरु मंत्र

All World Gayatri Pariwar 🔍 PAGE TITLES May 1948 दीक्षा और गुरु मंत्र दीक्षामादाय गायत्र्या ब्रह्मनिष्ठाग्रजन्मना। आरभ्यताँ ततः सम्यग्यिविधिनोपासना सता।। (ब्रह्मनिष्ठाग्रजन्मना) ब्रह्मनिष्ठ ब्राह्मण से (गायत्र्याः) गायत्री की (दीक्षाँ आदाय) दीक्षा लेकर (ततः) तब (सता) सत्स्वभाव वाले व्यक्ति को (सम्यग् विधिना) ठीक विधि से (उपासना आरभ्यताँ) उपासना आरंभ करनी चाहिए। अयमेव गुरोर्मन्त्रः यः सर्वोपरिराजते। विन्दौ सिन्धुरिवाँस्मिस्तु ज्ञान विज्ञानमाश्रितम्।। (अयमेव) यह ही (गुरोर्मन्त्रः) गुरुमंत्र है। (यः) जो (सर्वोपरि) सर्वोपरि (राजते) विराजमान है (विन्दौसिन्धुरिवः) एक बिन्दु में सागर के समान (अस्मिन्) इस मंत्र में (ज्ञान विज्ञानं) समस्त ज्ञान और विज्ञान (आश्रितं) आश्रित हैं। अध्यात्मिक जगत में गुरु का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। जन्म देने वाली माता और पालन करने वाले पिता के पश्चात् सुसंस्कृत बनाने वाले गुरु का ही स्थान है। भारतीय समाज में “निगुरा” एक गाली समझी जाती है। जिनका गुरु नहीं उसे असंस्कृत, अविकसित माना जाता है। कारण यह है कि गुरु के बिना मनोभूमि का ठीक प्रकार निर्माण नहीं हो पाता। माता, पिता कितने ही सुशिक्षित क्यों न हों पर वे अपने बालकों का उचित निर्माण करने में समर्थ नहीं होते। उन्हें अपने बालकों के प्रति स्वाभाविक मोह, पक्षपात, स्नेह होता है, इस अति के कारण बालक के प्रति उनकी निष्पक्ष दृष्टि नहीं रहती, वे उसे ठीक प्रकार समझ नहीं पाते, या समझने की स्थिति में नहीं होते। बच्चा तुतला कर बोल रहा हो तो माता पिता को बड़ा अच्छा लगता है, वे स्वयं भी उसके साथ वैसी ही तोतली बोली में बात करने लगते हैं और चाहते हैं कि बालक बार बार उसी प्रकार तोतली बोली बोले, अपने बालक को इस प्रकार बोलते देखकर उन्हें बड़ा आनन्द आता है। ऐसे अवसरों पर गुरु का दृष्टिकोण दूसरा होता है। वह देखता है कि इस प्रकार बोलने से बालक को आदत पड़ सकती है और वह आगे के लिए तुतलेपन की बीमारी से ग्रस्त हो सकता है। अतएव गुरु उस प्रकार के मोह ग्रस्त लाड़ चाव से दूर रह कर बालक को तोतली बोली बोलना रोककर उसे शुद्ध आचरण की शिक्षा देता है। लाड़ चाव के कारण, दुलार-स्नेह और असाधारण प्रेम के कारण माता पिता न तो बालकों पर नियंत्रण कर सकते हैं और न उसकी आन्तरिक स्थिति की वास्तविकता को समझ पाते हैं ऐसी दशा में उनके हाथ से बच्चों का अच्छा निर्माण नहीं हो पाता, इस कार्य को तो निष्पक्ष, निस्वार्थ, मोह, ममता से रहित, दूरदर्शी, सच्चा स्थायी हित चाहने वाले, ज्ञान वृद्ध गुरु ही कर सकते हैं। यही कारण है कि भारतीय अपने बालकों को थोड़ा सा समर्थ होते ही गुरुकुलों में भेजे देते थे और वहाँ उनका निर्माण होता था। ज्ञान के दो अंग हैं एक सिद्धान्त (थोरी) दूसरा अनुभव (प्रेक्टिस)। केवल सिद्धान्त समझने मात्र से कोई ज्ञान पूर्ण नहीं हो सकता। चिकित्सा, शिल्प, रसायन, संगीत, चित्रकारी, शस्त्रविद्या, यत्र संचालन, विज्ञान आदि की शिक्षा यदि केवल पुस्तक रूप से प्राप्त हो तो निश्चित रूप से अधूरी रहेगी। जिसने कपड़ा बुनने की कला को केवल सिद्धान्त रूप से तो समझा है पर करघा, सूत बुनाई आदि का क्रियात्मक रूप से व्यवहार नहीं किया है वह कपड़ा नहीं बुन सकता। इसी प्रकार जीवन की अगणित समस्याएं जिनका ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है, केवल स्कूल कॉलेजों की तोता रटंत से न तो समझी जा सकती है और न उनका हल मालूम होता है इसलिए किसी भी विषय की शिक्षा प्राप्त करनी होती है तो उस विषय के अनुभवी द्वारा उस विषय का क्रियात्मक ज्ञान प्राप्त किया जाता है, तभी सर्वांगपूर्ण शिक्षा मिल पाती है। आध्यात्म साधना के लिए तो अनुभव पूर्ण शिक्षा की अत्यधिक आवश्यकता है। क्योंकि प्रत्येक साधक की मनोभूमि, स्वास्थ्य, एवं परिस्थिति में भिन्नता होती है। इस भिन्नता के कारण उनकी साधनाओं में अन्तर करने की आवश्यकता पड़ती है। किसी के लिए कोई विधि व्यवस्था, उपयोगी बैठती है तो किसी के लिए उसमें हेर फेर करना जरूरी होता है। इन बातों को साधक स्वयं नहीं जान सकता। स्कूल में जाने वाले बच्चे स्वयं यह निर्णय करने में समर्थ नहीं होते कि हमें कौन पुस्तकें, किस क्रम से पढ़नी चाहिए यदि वे अपने आप, अपनी इच्छा से मन-मर्जी का पाठ्यक्रम चुनें और स्वयं अपनी शिक्षा विधि निर्धारित करें तो उनके लिए सफलता प्राप्त करना कठिन होगा, वे समय और शक्ति का दुरुपयोग करेंगे और उस लाभ से वंचित रहेंगे जो गुरु की मर्जी के अनुसार पढ़ने से उन्हें प्राप्त हो सकता था। साधना काल में कई बार कुछ विक्षेप उत्पन्न हो जाते हैं, उन विक्षेपों के, भूलों के, सुधार के लिए उपाय जानने की आवश्यकता होती है, कई बार विचित्र अनुभव आते हैं उनका कारण समझने की जरूरत पड़ती है, बीच बीच में परीक्षा करने की आवश्यकता अनुभव होती है जिससे यह मालूम पड़ता रहे कि साधना की प्रगति किस दिशा में, किस गति से हो रही है। यों कोई भी रोगी किसी चिकित्सा पुस्तक को लेकर अपनी दवा दारु कर सकता है, पर इस उपाय से अभीष्ट लाभ प्राप्त होगा ही यह नहीं कहा जा सकता। इसलिए किसी चतुर वैद्य के हाथ में चिकित्सा का उत्तरदायित्व सौंपना होता है। वैद्य देखता है कि रोगी को क्या रोग है, उसके लिए क्या चिकित्सा अच्छी पड़ेगी, इस निर्णय के लिए वह अपने चिर अनुभव को काम में लाता है और औषधि व्यवस्था करता है, फिर देखता है कि औषधि का क्या असर हो रहा है, उनके अनुसार हेर फेर करता है। मूत्र परीक्षा, जिह्वा परीक्षा, नाड़ी परीक्षा, वजन, थर्मामीटर, स्टोस्थेस्कोप आदि द्वारा यह जाँचता रहता है कि कितनी प्रगति हो रही है, उस प्रगति को संतुलित रखने के लिए वह रोगी को आवश्यक सलाह, पथ्य, परिचर्या आदि का आदेश करता रहता है। आध्यात्मिक साधना में साधक के लिए गुरु वही कार्य करता है जो रोगी के लिए वैद्य करता है। आध्यात्मिक मार्ग में आगे बढ़ने के लिए सब से प्रथम श्रद्धा और विश्वास को दृढ़ करने की आवश्यकता होती है। जैसे यात्रा के लिए दो पैरों को ठीक होना आवश्यक है, तैरने के लिए हाथों की जरूरत है वैसे ही योग मार्ग के लिए श्रद्धा और विश्वास दो मूलभूत तत्व हैं। इनके बिना इस मार्ग पर एक इंच भी प्रगति नहीं हो सकती। इन दोनों तत्वों को सबल बनाने के लिए उनका अभ्यास किसी ऐसे आधार पर करना होता है जो श्रेष्ठ हो, लाभदायक हो, प्राज्ञ हो, तथा प्रत्युत्तर देता हो। ऐसा आधार गुरु ही हो सकता है। सूक्ष्म, निराकार, अप्रत्यक्ष, ईश्वर या उसकी शक्तियों पर दृढ़ आस्था आरोपित करने से पूर्व श्रद्धा विश्वास को स्थूल आधार पर आरोपित करके उन्हें पुष्ट बनाया जाता है। गुरु के ऊपर आरोपित की हुई श्रद्धा- थोड़े ही समय में परिपक्व होकर ईश्वरीय निष्ठा के रूप में परिवर्तित हो जाती है। जैसे छोटी तीर कमान पर अभ्यास करते करते योद्धा लोग प्रचंड धनुष बाणों का प्रयोग करने में समर्थ हो जाते हैं वैसे ही गुरुभक्ति का अभ्यास, स्वल्प काल में ईश्वर भक्ति के रूप में परिणत हो जाता है। गुरु स्थापना के प्रत्यक्ष लाभ तो स्पष्ट हैं ही। यह एक प्रकार का आध्यात्मिक विवाह है। जिसमें दो व्यक्ति एक पवित्र उत्तरदायित्व को ओढ़ते हैं। गुरु अपने ऊपर उत्तरदायित्व लेता है कि शिष्य की आत्मा को ऊंचा उठाने में कोई कसर न रखूँगा। शिष्य अपने ऊपर उत्तरदायित्व लेता है कि गुरु के प्रति अगाध श्रद्धा रखता हुआ उनके आदेश को शिरोधार्य करूंगा। विवाह और दीक्षा में यद्यपि भौतिक दृष्टि से बहुत अन्तर नहीं है। दो आत्माएं जीवन भर के लिए पूरी ईमानदारी से एक दूसरे की उन्नति और सहायता का व्रत लेती हैं यही दीक्षा कहलाती है पति पत्नी की इस प्रतिज्ञा को विवाह, और गुरु शिष्य की प्रतिज्ञा को दीक्षा, मित्र 2 की प्रतिज्ञा को मैत्री या “पगड़ी पलटना” कहते हैं। इस प्रकार के व्रत बन्धन के पश्चात् अधिक जिम्मेदारी से कर्तव्य पालन के भाव दृढ़ होते हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि शिष्य के पाप पुण्यों का दसवाँ भाग गुरु को भी मिलता है। कारण स्पष्ट है कि शिष्य के निर्माण में गुरु का भारी उत्तरदायित्व उन कार्यों में उसे भागीदार बना देता है। गायत्री साधना के लिए गुरु की आवश्यकता होती है। इस कार्य के लिए ब्रह्मनिष्ठ, आत्मदर्शी, का वरण करना चाहिए। कोई श्रेष्ठ, अनुभवी, आत्मिक दृष्टि वाले सदाचारी व्यक्ति अपने समीप न हों तो दूरस्थ व्यक्तियों से भी यह हो सकता है। शरीर दूर दूर रहते हुए भी आत्माओं के लिए दूरी का कोई प्रश्न नहीं। दूरस्थ आत्माएं उसी प्रकार एक दूसरे की समीपता कर सकती हैं जिस प्रकार पास पास रहते हुए दो व्यक्ति आपस से निकटता अनुभव करते हैं। यदि ऐसी, दूरस्थ गुरु की भी व्यवस्था न हो सके, तो किसी स्वर्गीय महापुरुष की आत्मा को गुरुवरण किया जा सकता है। एकलव्य, कबीर आदि ने दूरस्थ व्यक्तियों को गुरु वरण करके अपने आप दीक्षा ले ली थी। इस प्रकार के दूरस्थ या स्वर्गस्थ गुरुओं के बारे में शिष्य को ऐसा भाव मन में धारण करना पड़ता है कि वे अपने समीप हैं, प्रसन्न हैं और गुरु के समस्त उत्तरदायित्वों को पूरा कर रहे हैं। दीक्षा के समय गुरु शिष्य को एक प्रधान विचार देते हैं। यह विचार-मंत्र-कहलाता है। मंत्रों में सर्वश्रेष्ठ, सर्वोपरि मंत्र गायत्री है, क्योंकि इसमें ज्ञान-साँसारिक ज्ञान, विज्ञान-आध्यात्मिक ज्ञान इस प्रकार भरा हुआ है जैसे बिन्दु में सिन्धु। जल की एक बूँद में वे सब तत्व मौजूद होते हैं जो समुद्र की विशाल जल राशि में होते हैं। बीज में वृक्ष का संपूर्ण आधार छिपा होता है, वीर्य की एक बूँद में सारे शरीर का ढाँचा सन्निहित रहता है। गायत्री मंत्र 24 अक्षर का है पर इसके गर्भ में ज्ञान विज्ञान के अनन्त भण्डागार छिपे पड़े हैं। इससे बड़ा कोई मंत्र नहीं, इसलिए इस वेदमाता को गुरु मंत्र के रूप में अन्तस्तल में धारण करना अधिक मंगलमय होता है। दीक्षा और गुरु मंत्र ग्रहण करने की विधि के साथ आरंभ की हुई गायत्री उपासना विशेष फलवती होती है, ऐसा शास्त्र का मत है। ----***---- gurukulamFacebookTwitterGoogle+TelegramWhatsApp Months January February March April May June July August September October November December अखंड ज्योति कहानियाँ महर्षि चरक (kahani) महर्षि दयानन्द (kahani) अण्डे बहा ले गया (kahani) कर्त्तव्य की परिधि (kahani) See More भारतीय संस्कृति को जानने शांतिकुंज पहुँचा अमेरिकी दल आत्मिक विकास में साधना महत्त्वपूर्ण : डॉ. प्रणव पण्ड्याजीहरिद्वार, २८ अक्टूबर।अमेरिका के 'द सेंटर फार थॉट ट्रांसफार्मेशन' का सात सदस्यीय दल साधनात्मक मार्गदर्शन प्राप्त करने शांतिकुंज एवं देवसंस्कृति विश्वविद्यालय पहुँचा। इन्होंने शांतिकुंज में नियमित रूप से चलने वाले ध्यान, योग व हवन आदि में भागीदारी करते हुए विशेष साधना का प्रशिक्षण प्रारंभ किया।दल का मार्गदर्शन करते हु More About Gayatri Pariwar Gayatri Pariwar is a living model of a futuristic society, being guided by principles of human unity and equality. It's a modern adoption of the age old wisdom of Vedic Rishis, who practiced and propagated the philosophy of Vasudhaiva Kutumbakam. Founded by saint, reformer, writer, philosopher, spiritual guide and visionary Yug Rishi Pandit Shriram Sharma Acharya this mission has emerged as a mass movement for Transformation of Era. Contact Us Address: All World Gayatri Pariwar Shantikunj, Haridwar India Centres Contacts Abroad Contacts Phone: +91-1334-260602 Email:shantikunj@awgp.org Subscribe for Daily Messages

मन्त्र दीक्षा के 33 लाभ

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9) घटाकाश और व्यापक परमात्मा के एकत्व का दैवी ज्ञान प्रगट होता है …दिव्य प्रेरणा  प्रगट होने लगती… आत्मा ब्रह्म है , जैसे घड़े का आकाश महा आकाश से जुड़ा  है ,एक ही है ,भिन्न नहीं है …ऐसे ही आप का आत्मा उस परमात्मा से जुड़ा हुआ है ..यह ज्ञान होगा..आत्मा ब्रम्ह है ..बुध्दी में चैत्यन्य  चिन्मय वासुदेव का प्रसाद  है…तो   ‘सब में वासुदेव है’… इस प्रकार  की दिव्यता का अनुभव होने लगता …भगवान की कथा समझ में आने लगती… संतो के दर्शन से रोमांचित होते… ये ब्रम्ह की खबर है… . एक कौर चावल को देखा आप ने तो आप को चावल का डेगा  देखने की जरुरत नहीं.. चुल्लू भर पानी से सरोवर के पानी की खबर मिलती… एक सूर्य की किरण से सूर्य की खबर मिलती … ऐसे एक हमारे आत्मा की खबर मिलती तो पुरे ब्रम्ह की खबर मिलती.. 84 लाख जन्मो के संस्कारो पे पैर देकर परम आनंद का अनुभव पाने में सफल होते.. 10) आप का आत्म विश्वास बढेगा, चिंता –निश्चिन्तता मे बदलती है..विवेक विकसित होता, अ-विवेकी निर्णय दूर होते. नाम जपने वाले के निर्णय और निगुरे के निर्णय देखो तो फरक पता चल जायेगा.. नाम जप करते तो शरीर को सताना सब छुट जाता है ..छोड़ना नहीं पड़ता, छुट जाता ही..और औचित्य बढ़ता और अनौचित्य  छुट जाता है .. 15) आप का  विवेक जागता है , औचित्य से परम औचित्य वासुदेव  का प्रसाद मिलता है ..की सुख और दुःख में उलझते नहीं.. न चाहते हुए भी दुःख की समस्या आई तो ये काल -चक्र है, ये समझ आती है …… जिस के सलाह कार साक्षात् भगवान श्रीकृष्ण हो; गांडीव धनुष्यधारी  अर्जुन , गदाधर भीम जैसे पुत्र थे ऐसे कुंता महारानी को भी कलह के दुःख कष्ट के दिनों से गुजरना पड़ता है… न चाहते हुए भी दुःख के दिन आये और नहीं मांगे तो भी सुख के लहराते दिन आये तो जीवन सुख–दुःख का ताना-बुना है… दोनों मे उलझना नहीं, आगे बढना है … दोनों का भोगी नहीं, योगी बनना है –  ये सत्संग से मति मिलती है.. ये मति सभी डिग्रियों  से भी नहीं मिलती.. इसलिए जो दीक्षा  देते, दीक्षा दिलवाते उन का बड़ा भारी  उपकार मानना चाहिए … 11) भय नाश होगा.. भयनाशन दुरमति हरण कलि मे हरी को नाम l निशि दिन नानक जो जपे सफल होवहि सब काम ll कलियुग मे हरी का नाम ही भय का नाश करनेवाला है..मन्त्र जाप से भय – निर्भयता में ,  घृणा – प्रेम में  और काम राम में  बदलने लगता है.. 12) शोक ख़तम होगा ..जैसे गाली देते तो द्वेष , घृणा  और अशांति पैदा होती है , वैसे मन्त्र से आनंद, माधुर्य , उत्साह और शांती  प्रगट होती है.. तो शोक नाश होता है.. 13) समानाधिकरण की वृत्ति विकसित होती…समता बढ़ने लगती .. समता बढती तो दुःख-सुख, लाभ-हानि  ये आने जाने वाली ऐसा अनुभव होता….. वैभव, यश-अपयश, प्रलोभन में सिकुड़ता नहीं.. इतना जय जयकार तो देवता के भाग्य में भी नहीं होता… पापी का मुर्दा जलता देखता तो उस की ऊँची गति कर देता… फिर भी अभिमान नहीं है.. इंद्र भी ऐसे महापुरुष के सामने अपने को कंगले मानते ऐसे घमंड नहीं करता…. कितने आंधी तुफान आते फिर भी चित्त को चोट नहीं करती.. कितनी भारी  उपलब्धि है… गुरूकृपा है ! 14) संसारी प्रेम शोषित करता है, भगवान से प्रेम पोषित करेगा…. धारणा  शक्ति बढती है,सूझ बुझ बढती है..संसारी  वासना को क्षीण कर देगा.. 15) स्वास्थ्य  , दीर्घायु की प्राप्ति होती है…..आयुष्य और आरोग्य मिलता है…. 16) जीवन सहज हो जायेगा..कोई वाहवाही करेगा तो भी गर्व से फुलोगे नहीं और कोई निंदा करेगा तो भी पिचोगे नहीं…. गुरू मंत्र नाम जपने  वाला सहेज जीवन का अधिकारी हो जाता है , आनंद प्रसन्न-ता स्वभाव में आती है 17) क्षमा शक्ति बढती है,  दीक्षा लेने के बाद क्रोध कम हो जाता है.. 18) शौर्य शक्ति बढती है….मन्त्र जप से वीर्य और तेज बढ़ता है..बल और विजय प्राप्त होता है.. ये 18 प्रकार के और 15 प्रकार के और फायदे भी होते ही है..मन्त्र जाप सदा  चलता रहे…कामधेनु मिल गयी तो इच्छा  पुर्ती करेगी , मनोरथ पूरा होगा..लेकिन मन्त्र जप से इतनी ऊँची अवस्था में  आ जाओगे की कोई इच्छा  ही नहीं रहेगी ऐसा परमात्म  वैभव की प्रगट होगा..बाहर  का वैभव कितना भी मिल गया तो  छूटेगा, लेकिन परमात्म  वैभव कभी नहीं छूटनेवाला वैभव है…श्रीकृष्ण भगवान इसिलए साधू संतो के पत्तले उठाते और उनके चरण धोते..इतनी महानता आती है.. मन्त्र दीक्षा से तीव्र शक्तियां  विकसित होती है…शरीर से पवित्र किरण निकलेगी.. 19) मन्त्र जापक मे इतनी शक्तियां  विकसित होती है की आगे घटित होने वाले घटनाओ की आहट पहेले ही  पता चल जाती है. 20) व्याधी नाशिनी शक्ति जागृत होती है..खुद के रोग व्याधी दूर करते ही है ,लेकिन दूसरो पर भी नजर  डालेंगे या मन्त्र जाप से पानी देंगे तो उनकी व्याधियां  मिटेंगी. 21) दुःख-हारी  शक्ति आती है..नारद जी भक्ति की नजर डालते तो लोग ठीक हो जाते..उनके दुःख दूर हो जाते..वो तो उस युग  की बात थी ..लेकिन इस कलियुग मे भी कलि का प्रभाव कम होगा ऐसी  दुःख- हारी  शक्ति का विकास होगा.. 22) पाप नाशिनी शक्ति का विकास होगा..कोई पापी की अगर मौत होती तो उसे मौत के बाद नारकीय जीवन मिलता है, लेकिन आप के सामने अगर उसकी मौत हुयी तो वो नरक मे नहीं जायेगा इतनी आप में  शक्ति विकसित होगी..एक आदमी का एक्सिडेंट हुआ था, मेरे मित्र संत लालजी महाराज का रिश्तेदार था, मौत के दिन गिन रहा था …तो सभी किये हुए पाप याद आने लगे, पश्चाताप  होने लगा…तो दुसरे महाराज ने उनपर कृपा की..बाद में  वो आदमी ठीक हो गया और कई साल बाद मारा…उसको मरते समय संत महाराज के दर्शन हो गए.. तो संत के सु-दर्शन से उसके पाप मिट गए , नारकीय जीवन से बच गया.. कबीरा दर्शन के संत के,साहिब आवे याद l लेखे मे वोही घडी , बाकि के दिन बाद …l l 23) दूसरे के मन की चंचलता मिटाने  की शक्ति विकसित होगी…काले कोट  देखेंगे  तो कोर्ट- कचेरी याद आती है , वैसे संत को देखेंगे तो प्रभु की याद आती है और मन की चंचलता मिटती है.. व्यक्ति शांत होता है..आप के पास आनेवाले लोगो को भी शांती  का अनुभव होगा… 24) प्रारब्ध के कु- अंक  मिटते है.. ‘मेटत  कु-अंक भाल के’ ..भाल माने  प्रारब्ध ..नसीब मे कुछ कु-अंक (बुरी घटना) होंगे तो उनका भंजन करनेवाली शक्ति विकसित होती है.. 25) शुभ कर्म मे सम्पूर्णता  आती है…44साल से सत्संग दे रहा हूँ कभी कोई सत्संग का कार्यक्रम आज तक फेल नहीं गया….ऐसी कार्य मे पूर्णता लेन की शक्ति का विकास होता है..जहां  भी प्रोग्राम होता है वहाँ  की समितिवाले मन्त्र जप करते है..तो ऐसा फायदा होता ही है..कार्य को सम्पूर्ण करने की शक्ति का विकास होता है.. 26) गुरु मन्त्र का जप करने से सारे  वेद  पठन करने का और सारे  तीर्थ करने का फल मिलता है..इसमे कोई खर्च नहीं, कोई कठिनाई नहीं..जब चाहे तब किया जा सकता है… मन्त्र जाप मम दृढ़ विश्वास l पंचम भजम सो बेद प्रकासा l l गुरु मन्त्र को दृढ़ विश्वास से जपने से वेद का ज्ञान प्रकशित होने लगता है… 27) शास्त्र के अर्थ अपने आप प्रगट होने लगते है ऐसी शक्ति विकसित होती है.. सुरेश महाराज का उदहारण सामने है…ऐसी कथाये प्रगट होती है की पढ़े लिखे लोग भी सुनते रहते है…पहले घर के दरवाजे बंद थे ऐसी उनकी नौबत थी..आवारा बोलते लोग..रात को 9 से 12 फिल्म देखते.. बाप दारु पिता..जनम देने वाली माँ मर गयी थी..छोटी मासी  सौतेली माँ बनकर आई थी..वोह कपडे सिलती, 15 रुपीया  18 रुपीया  जो कुछ मिलता  उसमे से भी सुरेश हाथ मार लेता  तो रोती  हुयी मेरे पास उनको पकड़ के लायी..बोली , “महाराज जो कुछ कमाती उसी में  गुजारा  होता नहीं, उसमे से भी सुरेश हाथ मारता है, नहीं देती तो कटोरी या घर में  जो कुछ मिलता बेच देता है..फिल्म देखता है ..सिगरेट  पिता है…मैं  तो थक गयी महाराज ..अब तो मैं  मर जाऊं  या, ये मर जाये”….मैंने कहा, “न तुम मरो न ये मरे…चल भैया मेरे साथ”..और ये बन्दा  चल दिया मेरे साथ…!…मन्त्र दिया..पहले सत्संग सुनता..अब तो महाराज हमारे से भी बढ़िया बोलते ..गुरू तो गुड रहे गया और चेला शक्कर बन गया…! … जहां हम  नहीं पहुंचते  ऐसी जगह पहुँच जाता है..अमेरिका, कैनाडा  सभी देश विदेशों  मे सत्संग कर के आया है..जिसके लिए घर के दरवाजे बंद रहते अब उसके लिए करोडो रुपये वाले फार्म हाउस , बंगले खुले होते है.. 28) साफल्य दायिनी शक्ति का विकास होता है..जो भी कार्य करते तो सफल होता है.. 29) आनंद दायिनी शक्ति जागृत होती है… इसिलए आप लोग कहते है.. गुरूजी तुम तसल्ली न दो,सिर्फ बैठे ही रहो महेफिल का रंग बदल जाएगा गिरता हुआ दिल भी संभल जायेगा….केवल आप के दर्शन से भी लोग आनंदित होने लगेंगे.. 30) बुध्दी प्रखर होती है..बड़े बड़े ज्ञानी भी इसीलिए सुनते है… 31) सुषुप्त  शक्तियां  जागृत होने लगती है. 32) ब्रह्म के समान अधिकार की वृत्ति बनेगी ऐसी ईश्वर से एकाकारता होगी…भगवत आनंद दायिनी शक्ति विकसित होती है.. 33) मुक्ति प्रदायिनी शक्ति विकसित होती है..ज्ञान ,मुक्ति ,शांती, नित्य सुख और अमरत्व की प्राप्ति होती है… इस प्रकार 33 प्रकार के फायदे होते ही है…इसके अलावा धन संपत्ति  की प्राप्ति…कोई डॉक्टर बन गया तो कोई प्रधान मंत्री बन गया ऐसे तो कई फायदे होते ही रहते… मन्त्र दीक्षा देने के लिए 2 शर्त है.. पहेली शर्त – रुपीया  , पैसा , फल फूल आदि कुछ भी नहीं लाना है… पूज्य बापूजी को इसकी जरुरत नहीं है.. दूसरी शर्त – दीक्षा लेने के बाद आगे एक ध्यान योग शिबिर मे आना है , जिस में साधक को बौध्दिक जगत में प्रवेश कराया जाता है.. जब दीक्षा लेने आयेंगे तो कुछ भी खाके नहीं आना है..आसन, शिव गीता और जप करने की माला लेकर आना है.. पूज्य बापूजी दीक्षा में वो ही मन्त्र देते है जिस भगवान पर / अल्लाह पर / गोद पर आप की श्रध्दा हो …क्यों की पूज्य बापूजी को  कोई मत अथवा पंथ नहीं चलाना है , उन को तो सभी का मंगल करना है … जैसे आप के घर में सभी विद्युत् के उपकरण हो , लाइट फिटिंग करी हो , लेकिन जब तक उस में पॉवर हाउस से जुड़ा केबल का तार नहीं जुड़ेगा तब तक कोई इलेक्ट्रिक साधन काम नहीं केरगा ….ऐसे ही मन्त्र जप का फल तभी मिलता है जब वो किसी आत्म वेत्ता महापुरुष द्वारा मिलता है … ऐसा मन्त्र जापक को ब्रम्हांडीय शक्तियों से जोड़ देता है…‘आत्मवेत्ता गुरू’ अर्थात  ऐसे महापुरुष जिन्हों ने आत्म-साक्षात्कार कर के ब्रम्हज्ञान में स्थिति पायी है ऐसे सच्चे संत ब्रम्हज्ञानी गुरू के द्वारा दीक्षा में मिला हुआ नाम का (मन्त्र)  जप   करने से ही आप को इस पोस्ट में वर्णन किये हुए ३३ लाभ मिलेंगे …पूज्य बापूजी के करोडो शिष्य पुरे भारत और पुरे विश्व में है …सभी को ये फायदे हुए है …किसी को 50 % किसी को 80 % तो किसी को 90 % ..जैसी जिस की श्रध्दा हो .. ॐ  शांती ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ MANTR DIKSHA KE 33 PHAYADE bhagavaan ka mantra japane se shakti milti hai..lekin vo hi mantra kisi guru dvara mantra diksha se milta hai to vo aap ko bramhandeeya   shakti se jodta hai…aap ki praarthana safal hoti hai… guru mantra ke jap se sabhi janmo ke paap naash honge.. JAP = J+P ‘j’ ka matalab janm maran ka naash aur ‘p’  ka matalab paap ka naash : isi ka nam jap hai. “  GAM GAM(गं गं ) ” bij mantra hai.. aniyamit masik ke liye ram baan  ilaj hai.. bhaaiyo ko pani padne ki beemari, dhaatu ke samandhi beemari hai to “ghAM ghAM (घं घं ) ” se rakshan hota hai.. mantra diksha se 33 prakar ke faayde hote hai… 1) bhagavaan ke nam ras me priti badhegi.. chinta, duahkh mitate , paap naash hote to bhagavaan me aanand aane lagata hai , sumiran dhyaan me aanand aane lagata hai..priti  ka ras pragat hota jayega.. 2) man ki chanchalta mitne lagegi, mantra jaap se adhyatmik tarange uttpann hoti hai..isase chitt men aanand aur shanti  vyaap jaati hai..chitt ki chanchalta mitati , manoraj  mitate, faalatu vicharo ka  shaman hota… chitt ko shanti  milti, samadhaan milta. 3) paramatma  ki prerna  hone lagegi, isht dev sapane me aakar darshan denge ya aur kisi prakar se aap ko maargadarshan milega.. …budhdi ki prasadi milti, achchhe  ko achchha aur bure ko bura samajhne ki soojh bujh milti..sahi galat ka  nirnay karne men antaryaami paramatma ki prerna milti to vyavahaarik gyan men soojh bujh aati… fir to raje maharajaon  ke sukh ko bhi tuchh maante.. 4) nam ka, dhan ka ahankar aur ghamand nahin hoga…ahankar galne lagata…dhan, pad , a-sat ka prabhaav galne lagata hai.. 5) man aur budhdi nirmal hoti hai ..budhdi me shudhd prakash aur prerna  hogi ki  kya karana hai, kab aur kaise karana hai… man budhdi ki pushti hoti jaati.. …guru  mantra ka jap karne se neerasta door hogi aur aastha  badhegi..budhdi  men shuddhi aati.. 6) rog beemari se ksheen nahin honge.. ‘rog aaya to shareer me aaya , main  to amar aatma hoon’  ye samajh vikasit hogi..mantra ke uchcharan  se hamare  shareer par — 5 gyanendriyan  aur 5 karmendriyon  par , livar aur hradaya par aisa prabhaav padta hai ki rog kan naash hote hai aur rakt ka pravaah shudhd hota hai….. .. rog pratikar ki shakti badhati..rogon ke kanon  ko bhagati hai .. 7) sukh me bahoge nahin aur dukh se daboge  nahin, unka saadhan banakar unnati karne ki budhdi vikasit hogi..jap karanevala vala dukhi khinn nahin hota. ..dukh mitenge, dukh ko ukhaad fekne vaale paramanand ki prapti hogi .. bhagavaan ke nam me ras aayega to dukho ki jad ukhaad  ke fekanevala aanand aaega..dukh nashini shakti badhati… bhavishya men dukh dene vali paristhitiyan  bhi ksheen hoti.. .   ‘sukh svapana dukh bulabula , donon hai mehman’ …sukh dukh aane-jaanevala hai -us ko jaananevala ‘main’  nitya hoon..is  prakar   sukh dukh ki thapedo se bachkar ham param aanand ke data ishwar ke raaste pahunchane men safal ho jaate… ‘sukh dukh man ko hai , main us ko dekhne vala hoon’  ye jaan kar sukh dukh ka bhi  upayog kar ke sukh dukh ko step bana lete hai..ishwar ke raaste  unnat hote jaate…. 8 ) guru mantra ke jap se sabhi janmo ke paap naash honge..(j+p =  ‘j’ ka matalab janm maran ka naash aur  ‘p’ ka matalab paap ka naash : isi ka nam jap hai.) paap mitne se  punyamay bhaav  banane lagata hai…paap ksheen hone lagate…paap mitate, punya  badhate. .. sunishchay karanevali paapanashini shakti jaagrit hoti…paap vaasna mitati, bevakoofi mitati , aap ko bevakuf bananevala bevakuf banta aur aap sajaag ho jaate! 9) ghatakaash aur vyapak paramatma ke ekatva ka daivi gyan pragat hota hai …divya prerna  pragat hone lagti… aatma brahm hai , jaise ghade ka aakash maha aakash se juda  hai ,ek hi hai ,bhinn nahin hai …aise hi aap ka aatma us paramatma se juda hua hai ..yah gyan hoga..aatma bramh hai ..budhdi men chaityanya  chinmay vaasudev ka prasad  hai…to   ‘sab men vaasudev hai’… is prakar  ki divyata ka anubhav hone lagata …bhagavaan ki katha samajh men aane lagti… santo ke darshan se romaanchit hote… ye bramh ki khabar hai… . ek kaur chaval ko dekha aap ne to aap ko chaval ka dega  dekhne ki jarurat nahin.. chullu bhar pani se sarovar ke pani ki khabar milti… ek soorya ki kiran se soorya ki khabar milti … aise ek hamare aatma ki khabar milti to pure bramh ki khabar milti.. 84 lakh janmo ke sanskaro pe pair dekar param aanand ka anubhav paane men safal hote.. 10) aap ka aatm vishvaas badhega, chinta –nishchintata me badalti hai..vivek vikasit hota, a-viveki nirnay door hote. nam japane vaale ke nirnay aur nigure ke nirnay dekho to farak pata chal jayega.. nam jap karte to shareer ko satana sab chhut jata hai ..chhodana nahin padta, chhut jata hi..aur auchitya badhataa aur anauchitya  chhut jata hai .. 15) aap ka  vivek jaagata hai , auchitya se param auchitya vaasudev  ka prasad milta hai ..ki sukh aur duahkh men ulajhte nahin.. n chahate hue bhi duahkh ki samasya aai to ye kaal -chakra hai, ye samajh aati hai …… jis ke salah kar sakshat bhagavaan shrikrishna ho; gaandeev dhanushyadhari  arjun , gadadhar bheem jaise putra the aise kunta maharani ko bhi kalah ke duahkh kasht ke dinon se gujarana padta hai… n chahate hue bhi duahkh ke din aaye aur nahin maange to bhi sukh ke laharate din aaye to jeevan sukh–duahkh ka tana-buna hai… donon me ulajhana nahin, aage badhana hai … donon ka bhogi nahin, yogi banana hai –  ye satsang se mati milti hai.. ye mati sabhi digriyon  se bhi nahin milti.. isaliye jo diksha  dete, diksha dilavate un ka bada bhari  upakar manna chaahiye … 11) bhaya naash hoga.. bhayanashan duramati haran kali me hari ko nam l nishi din nanak jo jape safal hovahi sab kaam ll kaliyug me hari ka nam hi bhaya ka naash karanevala hai..mantra jaap se bhaya – nirbhayata men ,  ghrina – prem men  aur kaam ram men  badalne lagata hai.. 12) shok khatam hoga ..jaise gaali dete to dvesh , ghrina  aur ashanti paida hoti hai , vaise mantra se aanand, madhurya , utsah aur shanti  pragat hoti hai.. to shok naash hota hai.. 13) samaanadhikaran ki vritti vikasit hoti…samata badhane lagti .. samata badhati to duahkh-sukh, labh-haani  ye aane jaane vali aisa anubhav hota….. vaibhav, yash-apayash, pralobhan men sikudataa nahin.. itana jaya jayakaar to devta ke bhagya men bhi nahin hota… paapi ka murda jalta dekhta to us ki oonchi gati kar deta… fir bhi abhimaan nahin hai.. indra bhi aise mahapurush ke saamane apane ko kangale maante aise ghamand nahin karta…. kitane aandhi tufaan aate fir bhi chitt ko chot nahin karati.. kitani bhari  uplabdhi hai… gurookripa hai ! 14) sansaari prem shoshit karta hai, bhagavaan se prem poshit karega…. dhaarna  shakti badhati hai,soojh bujh badhati hai..sansaari  vaasna ko ksheen kar dega.. 15) swasthya  , deerghaayu ki prapti hoti hai…..aayushya aur aarogya milta hai…. 16) jeevan sahaj ho jayega..koi vaahavahi karega to bhi garv se fuloge nahin aur koi ninda karega to bhi pichoge nahin…. guru mantra nam japane  vala sahej jeevan ka adhikari ho jata hai , aanand prasann-ta svabhaav men aati hai 17) kshama shakti badhati hai,  diksha lene ke baad krodh kam ho jata hai.. 18) shaurya shakti badhati hai….mantra jap se veerya aur tej badhataa hai..bal aur vijay prapt hota hai.. ye 18 prakar ke aur 15 prakar ke aur faayde bhi hote hi hai..mantra jaap sada  chalta rahe…kamadhenu mil gayi to ichha  purti karegi , manorath poora hoga..lekin mantra jap se itani oonchi avastha men  aa jaaoge ki koi ichha  hi nahin rahegi aisa paramatm  vaibhav ki pragat hoga..baahar  ka vaibhav kitana bhi mil gaya to  chhootega, lekin paramatm  vaibhav kabhi nahin chhootanevala vaibhav hai…shrikrishna bhagavaan isilye saadhu santo ke pattle uthate aur unake charan dhote..itani mahanta aati hai.. mantra diksha se tivra shaktiyan  vikasit hoti hai…shareer se pavitra kiran nikalegi.. 19) mantra japak me itani shaktiyan  vikasit hoti hai ki aage ghatit hone vaale ghatanao ki aahat pahele hi  pata chal jaati hai. 20) vyadhi nashini shakti jaagrit hoti hai..khud ke rog vyadhi door karte hi hai ,lekin doosaro par bhi najar  dalenge ya mantra jaap se pani denge to unki vyadhiyan  mitengi. 21) dukh-haari  shakti aati hai..narad ji bhakti ki najar daalte to log theek ho jaate..unake dukh door ho jaate..vo to us yug  ki baat thi ..lekin is kaliyug me bhi kali ka prabhaav kam hoga aisi  dukh- haari  shakti ka vikas hoga.. 22) paap nashini shakti ka vikas hoga..koi paapi ki agar maut hoti to use maut ke baad narakeeya jeevan milta hai, lekin aap ke saamane agar usaki maut huyi to vo narak me nahin jayega itani aap men  shakti vikasit hogi..ek aadami ka eksident hua tha, mere mitra sant lalaji maharaj ka rishtedaar tha, maut ke din gin raha tha …to sabhi kiye hue paap yad aane lage, pashchatap  hone laga…to dusare maharaj ne unapar kripa ki..baad men  vo aadami theek ho gaya aur kai saal baad mara…usako marte samay sant maharaj ke darshan ho ge.. to sant ke su-darshan se usake paap mit ge , narakeeya jeevan se bach gaya.. kabira darshan ke sant ke,sahib aave yad l lekhe me vohi ghadi , baki ke din baad …ll 23) doosare ke man ki chanchalta mitane  ki shakti vikasit hogi…kaale kot  dekhenge  to kort- kacheri yad aati hai , vaise sant ko dekhenge to prabhu ki yad aati hai aur man ki chanchalta mitati hai.. vyakti shaant hota hai..aap ke paas aanevaale logo ko bhi shanti  ka anubhav hoga… 24) prarabdh ke ku- ank  mitate hai.. ‘metat  ku-ank bhal ke’ ..bhal maane  prarabdh ..naseeb me kuch ku-ank (buri ghatna) honge to unka bhanjan karanevali shakti vikasit hoti hai.. 25) shubh karm me sampoornata  aati hai…44saal se satsang de raha hoon kabhi koi satsang ka karyakram aaj tak fel nahin gaya….aisi karya me poornata len ki shakti ka vikas hota hai..jahan  bhi program hota hai vahan  ki samitivaale mantra jap karte hai..to aisa faayda hota hi hai..karya ko sampoorn karne ki shakti ka vikas hota hai.. 26) guru mantra ka jap karne se saare  ved  pathan karne ka aur saare  teerth karne ka fal milta hai..isme koi kharch nahin, koi kathinaai nahin..jab chahe tab kiya ja sakta hai… mantra jaap mam dridh vishvaas l pancham bhajam so bed prakasa ll guru mantra ko dridh vishvaas se japane se ved ka gyan prakashit hone lagata hai… 27) shastra ke arth apane aap pragat hone lagate hai aisi shakti vikasit hoti hai.. suresh maharaj ka udahaaran saamane hai…aisi kathaye pragat hoti hai ki पढ़े likhe log bhi sunte rahate hai…pahle ghar ke daravaaje band the aisi unki naubat thi..aavara bolte log..rat ko 9 se 12 film dekhte.. baap daru pita..janam dene vali maan mar gayi thi..chhoti masi  sauteli maan bankar aai thi..voh kapade silti, 15 rupeeya  18 rupeeya  jo kuch milta  usme se bhi suresh haath maar leta  to roti  huyi mere paas unako pakad ke layi..boli , “maharaj jo kuch kamaati usi men  gujara  hota nahin, usme se bhi suresh haath marta hai, nahin deti to katori ya ghar men  jo kuch milta bech deta hai..film dekhta hai ..sigaret  pita hai…main  to thak gayi maharaj ..ab to main  mar jaaoon  ya, ye mar jaaye”….mainne kaha, “n tum maro n ye mare…chal bhaiya mere saath”..aur ye banda  chal diya mere saath…!…mantra diya..pahle satsang sunta..ab to maharaj hamare se bhi badhiya bolte ..guru to gud rahe gaya aur chela shakkar ban gaya…! … jahan ham  nahin pahunchte  aisi jagah pahunch jata hai..amerika, kainada  sabhi desh videshon  me satsang kar ke aaya hai..jisake liye ghar ke daravaaje band rahate ab usake liye karodo rupaye vaale faarm haus , bangale khule hote hai.. 28) saafalya daayini shakti ka vikas hota hai..jo bhi karya karte to safal hota hai.. 29) aanand daayini shakti jaagrit hoti hai… isilye aap log kahate hai.. guruji tum tasalli n do,sirf baithe hi raho mahefil ka rang badal jaayega girta hua dil bhi sanbhal jayega….keval aap ke darshan se bhi log aanandit hone lagenge.. 30) budhdi prakhar hoti hai..bade bade gyani bhi isiliye sunte hai… 31) sushupt  shaktiyan  jaagrit hone lagti hai. 32) brahm ke samaan adhikar ki vritti banegi aisi ishwar se ekakarta hogi…bhagvat aanand daayini shakti vikasit hoti hai.. 33) mukti pradayini shakti vikasit hoti hai..gyan ,mukti ,shanti, nitya sukh aur amaratva ki prapti hoti hai… is prakar 33 prakar ke faayde hote hi hai…isake alava dhan sanpatti  ki prapti…koi doktar ban gaya to koi pradhaan mantri ban gaya aise to kai faayde hote hi rahate… mantra diksha dene ke liye 2 shart hai.. paheli shart – rupeeya  , paisa , fal fool aadi kuch bhi nahin lana hai…Pujya Bapuji ko  isaki jarurat nahin hai.. doosari shart – diksha lene ke baad aage ek dhyaan yog shibir me aana hai , jis men saadhak ko baudhdik jagat men pravesh karaya jata hai.. jab diksha lene aayenge to kuch bhi khake nahin aana hai..aasan, shiv geeta aur jap karne ki mala lekar aana hai.. Pujya Bapuji diksha me vo hi mantr dete hai jis bhagavan ka / Allah ka athavaa GOD ka naam aap ko achhaa lage…kyo ki Pujya BApuji ko koyi mat athavaa panth chalaanaa nahi hai….un ko sabhi ka mangal karanaa hai… jaise aap ke ghar me sabhi vidyut upkaran ho, light fitting kiya ho , lekin jab tak power house se joda huaa cable ka taar nahi judegaa tab tak koyi electrik sadhan kaam nahi karenge…power house se juda huaa patalaa cable bhi jod denge to fridge pani thanda  karega, gyser pani garam karega, pankha thandi havaa degaa….aise hi mantr jap ka phal tabhi milataa hai jab vo kisi  AATM-VETTAA  mahapurush se milataa hai…aisa mantr jaapak ko bramhaandiy shaktiyon se jod detaa hai …. “AATM-VETTAA GURU”  arthaat aise Mahapurush jinhon ne aatm-sakshatkar kar ke BRAMHGYAN me sthiti payi hai aise sachche sant Bramhgyani GURU ke dwara diksha me mila huaa naam ka jap (Mantr)  karane se hi aap ko is post me varnan kiye huye sabhi  33 LABH milenge …Pujya Bapuji ke karodo karodo shishy pure Bharat me aur Vishw me hai ..sabhi ko phayade huye hai ..kisi ko 50 % kisi ko 80 % kisi ko 90 % jis ki jaisi shradhda ho…. AUM SHANTII ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ Advertisements Share this: Email Print Leave a Reply Your email address will not be published. Required fields are marked * Comment Name * Email * Website Post Comment Notify me of new comments via email. Sangeeta Sharma on February 26, 2012 at 10:08 am Pujya Gurudev Ke Shri Charno Me Mera Pranam..Mantra Diksha Ke LABH Padhkar Atmik Shanti Man Ko Mili..Hari Om……-Sangeeta Jaipur.. Reply Sangeeta Sharma on February 26, 2012 at 10:16 am Muje Pujya Guredev Ki Kripa Or Mantra Diksha Se Meri Study or Anya Karyo Me Muje Safalta Prapt Hui H..Mera Pujya Shri Ki Kripa Se PHD Me University Of Rajasthan Jaipur Me Selection Hua H..Bapuji Ka Pyar Uhi Ham Sub Pr Bana Rahe..Or Uhi Hamesha Gurudev Ka Sath Hm Sb Par Bana Rahe..Hari Om…-Sangeeta Sharma JAIPUR..Rajasthan. Reply gopi on March 1, 2012 at 1:27 pm hari om…pujya bapuji ka satsang mumbai me 3 aur 4 march……sadho…. Reply umesh thakur on October 4, 2012 at 12:17 pm bhagban nahi hota hai but aatma hoti hai . Reply umesh thakur on October 4, 2012 at 12:21 pm yeh dharm ki bat sab jante hai. giyan dena hai to insan ke marne ke bad kiya hota hai ……….. Reply Abhishek on November 12, 2012 at 8:56 am Can you please tell us how to get Guru Mantra..because i am in hyderabad ..how can i meet with Pujya bapu ji ?could you plz help.. Reply sonia on February 16, 2013 at 3:50 pm I want chitta shanti,balance of mind body nd soul…..how to convert music of my heart to be melodious…i believe in all religion deep of my heart….above all humanity is my religion…….how can I get mantra diksha,33 year old unmarried,working Reply Rohit gupta on May 12, 2013 at 12:27 pm Sharir me verye ki kami kaise puri ho sakti h? Reply priti kadam on October 19, 2014 at 3:16 pm pranam gurudev, mai ek gaon me rahenevali ladki hu,muze mare andar ki shakti ko janana hai,kya ap meri madat karenge? sorry mai ap ke yaha pahunch nahi paungi esiliye mai msg dwara apse madat mang rahi hu.muze manav ke janam ke bare me janana hai,manav ka janma kyui hota hai?,janma ke prati uske kartvya kya hai?or bhagvan ka rup kaisa hai ye dekhana hai.kya ap meri madat kar sakte hai,or ek bat jo hum sabko dikhta hai vo satya hai ki jo hum sabko dikhta nahi wo satya hai.pls reply Reply dev dheeraj on April 9, 2016 at 7:36 pm guru g mujhe diksha lena hai Reply Join Us on Facebook Join Us on Facebook Email Subscription Enter your email address to subscribe to this blog and receive notifications of new posts by email. Join 33,713 other followers Sign me up! 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गुरु मंत्र अथवा दीक्षा कब मिलती है?

Vedic Aim वेद, उपनिषद, गीता, भागवत, वेदांत और अन्य ग्रंथों का सार एवम सरल रूप ज्ञान सबको प्रदान करना कविता संख्या के साथ, हमारा परम उद्देश्य हैं। गुरु मंत्र अथवा दीक्षा कब मिलती है? ❛गुरु मंत्र अथवा दीक्षा क्या होती है?❜ हमने इस लेख में जो ढोंगी बाबा गुरु मंत्र अथवा दीक्षा देते है उनका पहचान बताया और यह बताया की गुरु मंत्र अथवा दीक्षा को कोई अलौकिक शक्ति कहता है, तो कोई दिव्य आनंद और कोई दिव्य प्रेम आनंद कहता है। यदपि यह सब एक ही है। दीक्षा देना का मतलब अलौकिक शक्ति देना भी है, दिव्य प्रेम देना भी है और दिव्य आनंद देना भी है। अब एक प्रश्न है। दीक्षा कब मिलती है? जब हमारा अंतःकरण (मन) शुद्ध हो जाता है तब दीक्षा मिलती है। शुद्ध का मतलब संछेप में समझिये जब अंतःकरण (मन) एक भोले भाले बच्चे की तरह हो जाता है, वह बच्चा न तो किसी के बारे में बुरा सोचता है न तो किसी के बारे में अच्छा सोचता है, अर्थात संसार से उस बच्चे का मन ना तो राग (प्रेम) करता है और ना तो द्वेष (दुश्मनी) करता है। जब किसी वक्ति का अंतःकरण भगवान में मन लगाकर, इस अवस्था पर पहुँच जाता है। तब वास्तविक गुरु आपके अंतःकरण को दिव्य बनायेगा। तब वास्तविक गुरु अथवा संत अथवा महापुरुष आपको गुरु मंत्र या दीक्षा देता है। अब दीक्षा का समय आया है, जब अंतःकरण शुद्ध हो गया। इससे पहले दीक्षा नहीं दी जा सकती। क्योंकि हमारा अंतःकरण उस अलौकिक शक्ति को सम्हाल (सहन)नहीं सकता। अगर कोई गुरु अथवा महापुरुष बिना अधिकारी बने किसी को जबरदस्ती दीक्षा देदें, तो उस व्यक्ति का शरीर फट के चूर-चूर हो जाये। वह अनधिकारी व्यक्ति सहन नहीं सकता। हमारा (माया अधीन जिव) का अंतःकरण इतना कमजोर है की उस दीक्षा (अलौकिक शक्ति/ दिव्य आनंद, दिव्य प्रेम आनंद) को सहन नहीं कर सकता। हम लोग संसार के सुख और दुःख को ही नहीं सम्हाल (सहन) कर सकते है। जैसे एक गरीब को १ करोड़ की लॉटरी खुल जाये, तो वह बेहोश हो जाता है, किसी की प्रेमिका प्रेमी अथवा माता पिता संसार छोड़ देते है, तो उसका दुःख भी वह व्यक्ति नहीं सम्हाल पता है। तो यह जो अलौकिक शक्ति (दिव्य आनंद) है इसे कोई क्या सम्हाल पायेगा। ये दीक्षा अनेक प्रकार से दी जाती है। अगर वह दीक्षा बोलके दी जाये तो उसे हमलोग गुरु मंत्र कहते है। वास्तविक गुरुओं ने अनेक तरीकों से दीक्षा दिया है, कभी कान में बोल के, आँख से देख के, गले लगाके यहाँ तक फूक मर कर दिया है। दीक्षा देना है, किसी बहाने देदें, चाहे एक घुसा मार के देदें। दीक्षा देने में यह आवश्यक नहीं है की कान से दिया जाये। गौरांग महाप्रभु ने गले लगाके दीक्षा दिया है। दीक्षा का अर्थ होता है: "गुरु के पास रहकर सीखी गई शिक्षा का समापन (अंत)।" दीक्षा के अर्थ से ही समझ लीजिये। जब आप गुरु के पास रह कर सारा ज्ञान ले लगे और गुरु के अनुसार चल कर अपने अंतःकरण को शुद्ध कर लगे। तब अंत में गुरु आपको दीक्षा दे देगा। दीक्षा मिलने के बाद शिष्य को गुरु से कुछ और पाना सेष नहीं रहता। दीक्षा देना अर्थात गुरु के द्वारा शिक्षा का समापन (अंत)। यह दीक्षा मतलब भगवन प्रेम होता है। जिसे गुरु अंतःकरण शुद्ध होने के बाद दे देते है। और दीक्षा आपको मांगना नहीं पड़ता। गुरु आपको बिना मांगे दे देगा, चाहे वो आपसे किती भी दूर क्यों न हो। अवश्य पढ़े ❛क्या करे अगर हमारा गुरु वास्तविक गुरु नहीं है।❜ कर्म काण्ड गुरु ज्ञान काण्ड भक्ति / उपासना काण्ड You Might Also Like सामवेद यह गेय ग्रन्थ है। इसमें गान विद्या का भण्डार है, यह भारतीय संगीत का मूल है। ऋचाओं के गायन को ही साम कहते हैं। इसकी १००१ शाखाएं थीं। परन्तु आजकल तीन ही प्रचलित हैं - कोथुमीय, जैमिनीय और राणायनीय। इसको पूर्वार्चिक और उत्तरार्चिक में बांटा गया है। पूर्वार्चिक में चार काण्ड हैं - आग्नेय काण्ड, ऐन्द्र काण्ड, पवमान काण्ड और आरण्य काण्ड। चारों काण्डों में कुल ६४० मंत्र हैं। फिर महानाम्न्यार्चिक के १० मंत्र हैं। इस प्रकार पूर्वार्चिक में कुल ६५० मंत्र हैं। छः प्रपाठक हैं। उत्तरार्चिक को २१ अध्यायों में बांटा गया। नौ प्रपाठक हैं। इसमें कुल १२२५ मंत्र हैं। इस प्रकार सामवेद में कुल १८७५ मंत्र हैं। इसमें अधिकतर मंत्र ❛ऋग्वेद❜ से लिए गए हैं। इसे उपासना का प्रवर्तक भी कहा जा सकता है। प्राचीन आर्यों द्वारा साम-गान किया जाता था। सामवेद चारों वेदों में आकार की दृष्टि से सबसे छोटा है और इसके १८७५ मन्त्रों में से ६९ को छोड़ कर सभी ऋगवेद के हैं। केवल १७ मन्त्र अथर्ववेद और यजुर्वेद के पाये जाते हैं। फ़िर भी इसकी प्रतिष्ठा सर्वाधिक है, जिसका एक कारण गीता में कृष्ण द्वारा वेदानां सामवेदोऽस्मि कहना भी है।… KEEP READING मनुष्य कितने दुखों से पीड़ित है? सबसे बड़ा दुःख? वेद में ताप को दुःख भी कहा जाता है। विश्व का प्रतेक जीव (व्यक्ति) दुखी है। तीन प्रकार के तापो (दुखों) से तप रहा है। आध्यात्मिक (दैहिक), आधिभौतिक (भौतिक) और आधिदैविक (दैविक) केवल यह तीन प्रकार के ताप (दु:ख) हैं संसार के सभी जीवों (मनुष्यों) को। यही ताप प्रेरक छण और प्रेरक जीवों (माया के अधीन मनुष्य) को दुःखमय बनाये हुए हैं। इन तीनों में सबसे प्रमुख है आध्यात्मिक ताप जिसे दैहिक दुःख भी कहते है। आध्यात्मिक (दैहिक) आध्यात्मिक दुःख भी दो प्रकर का होता है:- १. शारीरक और २. मानसिक। इन दोनों में मानसिक ताप (दुख) सबसे बड़ा दुखदाई है। १.शारीरक ताप जो शरीर की रोग है, यह शारीरक ताप (दुःख) कहलाती है। आप जानते ही है। आज बुखार है, तो कलअतिसार (डायरिया) है, आज ब्लड प्रेशर बढ़ गया तो कल डाइबटीज हो गया। इतनी जटिल शरीर की बनावट है की कोई न कोई भाग गड़बड़ रहता ही है। फिर मनुष्य भी असावधान है विषयों का लोलुप (लालची) है, कोईसंयम से आहार विहार व्यवहार नहीं रहता। इसलिए सदा प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी रोग से ग्रस्त (पीड़ित) हैं। और अगर मान लो कोई करोड़ों में कोई एक ऐसा व्यक्ति भी हो। तो मानसिक रोग से तो सब के … KEEP READING आयुर्वेद आयुर्वेद (आयुः + वेद = आयुर्वेद) विश्व की प्राचीनतम चिकित्सा प्रणालियों में से एक है। यह ऋग्वेद का उपवेद है। यह विज्ञान, कला और दर्शन का मिश्रण है। ‘आयुर्वेद’ नाम का अर्थ है, ‘जीवन का ज्ञान’ और यही संक्षेप में आयुर्वेद का सार है। हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम्। मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते॥ -(चरक संहिता १/४०) (अर्थात जिस ग्रंथ में - हित आयु (जीवन के अनुकूल), अहित आयु' (जीवन के प्रतिकूल), सुख आयु (स्वस्थ जीवन), एवं दुःखआयु (रोग अवस्था) - इनका वर्णन हो उसे आयुर्वेद कहते हैं।) आयुर्वेद और आयुर्विज्ञान दोनों ही चिकित्साशास्त्र हैं परन्तु व्यवहार में चिकित्साशास्त्र के प्राचीन भारतीय ढंग को आयुर्वेद कहते हैं और ऐलोपैथिक प्रणाली (जनता की भाषा में 'डाक्टरी') को आयुर्विज्ञान का नाम दिया जाता है। आयुर्वेद का परिभाषा एवं व्याख्या आयुर्वेद विश्व में विद्यमान वह साहित्य है, जिसके अध्ययन पश्चात हम अपने ही जीवन शैली का विश्लेषण कर सकते है। (1) आयुर्वेदयति बोधयति इति आयुर्वेदः। अर्थात जो शास्त्र (विज्ञान) आयु (जीवन) का ज्ञान कराता है उसे आयुर्वेद कहते हैं। (2) स्वस्थ… KEEP READING क्या राम और कृष्ण एक ही हैं? भगवान के अवतारों में भेद-भाव करना ये ❛नामापराध❜ हैं। और ❛नामापराध❜ से बड़ा कोई पाप नहीं हुआ करता। भगवान के जितने भी अवतार है उनमे भेद-भाव करना अपराध हैं। भगवान के किसी भी अवतार में भेद बुद्धि नहीं लगनी चाहिए और खास तोर से राम-कृष्ण अवतार में। और सभी अवतार में तो शरीर का अंतर हैं, देखने मे! जैसे नरसिंह अवतार, वराह अवतार, मत्स्य अवतार। लेकिन! राम कृष्ण में तो शरीर में भी भेद नहीं हैं। अध्यात्म रामायण में ब्रह्मा ने कहा था "मायातीतं माधवमाद्यं जगदािदं"हे राम तुम माया तित(माया से परे), मायाधीश हो और तुम माधव हो। ब्रह्मा माधव कह रहे है। अरे ब्रह्मा जी! आप की बुद्धि ख़राब है क्या? ब्रह्मा जी ये तो राघव है, माधव तो द्वापर में अवतार लेके आये थे। फिर ब्रह्मा बोले अध्यात्म रामायण "वन्दे रामं मरकतवर्णं"हे राम, मै आपको प्रणाम करता हूँ, जो मरकतवर्णं के आप हैं। मरकतवर्णं अर्थः मथुरा के धीश। अब सोचों मथुरा से क्या मतलब है राम का? राम तो मथुरा गये ही नहीं, रामाअवतार में। और ये भी सुनो अध्यात्म रामायण "वृन्दारण्ये वन्दितवृन्दारकवृन्दं" वृंदावन में रहने वाले मेरे राम। ध्… KEEP READING वेद का विभाजन वेद के चार भाग क्यों हुआ ऋषि कृष्ण द्वैपायन भगवान के अवतार है। श्रीकृष्ण का जन्म द्वापर में हुआ और ऋषि कृष्ण द्वैपायन जी भी द्वापर में हुए इन्हे आज वेदव्यास जी के नाम से जाना जाता है। द्वापर युग के अंत में जब कलियुग का प्रारम्भ हो रहा था, तब एक समस्या उत्पन्य होने लगी। क्योंकि वेद एक था और पहले एक वेद के सम्पूर्ण ज्ञान को एक व्यक्ति याद रख लेता था परन्तु कलियुग के मनुष्य को सम्पूर्ण वेद का ज्ञान याद करना संभव नहीं था। इसलिए उस वक के ऋषि मुनियों ने वेद के विभाजन करने की इच्छा की। परन्तु वेद का विभाजन करना इतना सरल नहीं हैं। फिर वेद का विभाजन कौन करें, तो फिर वेदव्यास जी को चुना गया। क्योंकि वेदव्यास जी के बुद्धि की तुलना उस वक्त कोई और नहीं कर सकता था। और वेदव्यास वेद के दो विरोधी मंत्रो का समाधान करते थे। इसलिए ऋषि कृष्ण द्वैपायन अर्थात वेदव्यास जी ने उस समय के ऋषिओं के आज्ञा से वेद का चार भाग किया। वेद के चार भाग हैं यह वेद चार भागों में विभाजित हुए १. ❛ऋग्वेद❜ २.यजुर्वेद ३. ❛सामवेद❜ ४. ❛अथर्ववेद❜ सृष्टि के प्रारंभ में वेद अविभक्त तथा एक लाख मंत्र वाला था। अठाइसवें द्वापर में वेदव्य… KEEP READING धर्म क्या है? धर्म के प्रकार? परधर्म व अपरधर्म क्या है? धर्म का अर्थ होता है "धारण करना" या "धारण करने योग" वेदों में दो प्रकार के धर्मों का वर्णन हैं, १.परधर्म २.अपरधर्म। अपरधर्म माने "वर्णाश्रम धर्म"  वर्णा माने, "ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र", और आश्रम मने, "ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास यह चार आश्रम हैं।"  जैसे ब्राह्मण क्या करे क्या ना करे, उसके बारे में वेदों में बहुत कुछ विस्तार से लिखा है, जैसे ब्राह्मण ब्रह्मचर्य में क्या करे क्या ना करे, फिर गृहस्थ में क्या करे क्या न करे, वानप्रस्थ और संन्यास  में क्या करे क्या न करे, वैसे ही क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र केलिए भी लिखा हैं। वेदों में वर्णाश्रम धर्म का बड़ा लंबा -चौड़ा उलेख है, अगर इस जन्म में कोई पढ़े और पालन करे, तो वो असंभव बात है। परधर्म का अर्थ संक्षेप में होता है भगवान(श्री कृष्ण, राम, संकर आदि) की भक्ति। लेकिन परधर्म में कामना नहीं होती, यानि "हेतु के बिना" अर्थात अहेतुकी जो भक्ति होती है, वो परधर्म है। तोपरधर्म मतलब भगवान(श्री कृष्ण, राम, संकर आदि) उनका नाम, उनका रूप, उनकी लीला, उनके गुण, उनके धाम, उनके … KEEP READING यजुर्वेद यजुर्वेद हिन्दू धर्म का एक महत्त्वपूर्ण श्रुति धर्मग्रन्थ और चार वेदों में से एक है। इसमें यज्ञ की असल प्रक्रिया के लिये गद्य और पद्य मन्त्र हैं। ये हिन्दू धर्म के चार पवित्रतम प्रमुख ग्रन्थों में से एक है और अक्सर ऋग्वेद के बाद दूसरा वेद माना जाता है - इसमें ऋग्वेद के ६६३ मंत्र पाए जाते हैं। फिर भी इसे ऋग्वेद से अलग माना जाता है क्योंकि यजुर्वेद मुख्य रूप से एक गद्यात्मक ग्रन्थ है। यज्ञ में कहे जाने वाले गद्यात्मक मन्त्रों को ‘'यजुस’' कहा जाता है। यजुर्वेद के पद्यात्मक मन्त्र ॠग्वेद या अथर्ववेद से लिये गये है। इनमें स्वतन्त्र पद्यात्मक मन्त्र बहुत कम हैं। यजुर्वेद में दो शाखा हैं : दक्षिण भारत में प्रचलित कृष्ण यजुर्वेद और उत्तर भारत में प्रचलित शुक्ल यजुर्वेद शाखा। नाम और विषय यजुस के नाम पर ही वेद का नाम यजुस+वेद(=यजुर्वेद) शब्दों की संधि से बना है। यज् का अर्थ समर्पण से होता है। पदार्थ (जैसे ईंधन, घी, आदि), कर्म (सेवा, तर्पण ), श्राद्ध, योग, इंद्रिय निग्रह। इत्यादि के हवन को यजन यानि समर्पण की क्रिया कहा गया है। इस वेद में अधिकांशतः यज्ञों और हवनों के नियम और विधान हैं, … KEEP READING भगवान से हमारा (जीव या आत्मा का) चार सम्बन्ध है। गीता ९.१८ "गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्।" अर्थात भगवान हमारे सबकुछ है। "त्वमेव माता च पिता त्वमेव...त्वमेव सर्वम् मम देव देव ॥" अर्थात भगवान ही हमारे सब कुछ है। सम्बन्ध का अर्थ, भगवान या संसार कौन हमारा सम्बन्धी है? इस लेख में हमने बताया कि हमारा सम्बन्ध केवल भगवान से ही है। भगवान से हमारा चार सम्बन्ध १. साजात्य सम्बन्ध २. सख्य सम्बन्ध ३. सादेश्य सम्बन्ध ४. सायुज्य सम्बन्ध यह चारों सम्बन्ध भगवान और जीव का गहरे-गहरे सम्बन्ध है। साजात्य सम्बन्ध साजात्य सम्बन्ध मतलब एक जाति। तो भगवान और आत्मा (हम) एक जाति के हैं। क्यों? इसलिए क्योंकि भगवान भी चेतन और हम (आत्मा) भी चेतन। भगवान हमारा अंशी या ऐसा कहे हम (आत्मा) उसके अंश। सख्य सम्बन्ध भगवान हमारा सखा है। क्यों? इसलिए क्योंकि एक सखा सदा हमारे साथ रहता है और हमारी मदद करता है। वैसे ही भगवान सदा हमारे साथ रहते है। हम जहाँ-जहाँ जाते हैं, वहाँ-वहाँ भगवान साथ रहते है।बृहदारण्यकोपनिषद् ४.३.३५ 'भगवान हमारे साथ जाते है जहाँ-जहाँ यह आत्मा जाती है।' हम मरने के बाद कुत्ते-गधे बने तो भगवान भी हमारे साथ-साथ आय… KEEP READING Terms Of Services Privacy Policy Disclaimer Copyright © 2016-17 Vedicaim.com All rights reserved ✿जीव ✤माया ✿भगवान - ✿ज्ञान काण्ड ✤कर्म काण्ड ✿भक्ति / उपासना काण्ड - ✿गुरु ✤त्यौहार - ✤संपर्क करें ✿हमारा उद्देश्य

गुरु मंत्र अथवा दीक्षा क्या होती है?

ⓘ Optimized just nowView original http://www.vedicaim.com/2017/07/guru-mantr-deeksha.html?m=1 Vedic Aim Skip to main content वेद, उपनिषद, गीता, भागवत, वेदांत और अन्य ग्रंथों का सार एवम सरल रूप ज्ञान सबको प्रदान करना कविता संख्या के साथ, हमारा परम उद्देश्य हैं। गुरु मंत्र अथवा दीक्षा क्या होती है? महापुरुष को ही गुरु कहते है। गुरु के बारे में जानने के लिए पढ़े ❛गुरु कौन है, अथवा गुरु क्या है?❜ ये जो गुरु लोग कान में मंत्र देते है या गुरु मंत्र देते है या कहों दीक्षा देते है, ये क्या है? यह भगवान का नाम है। जैसे 'रां रामाय नमः", 'क्लीं कृष्णाय नमः', 'नमो भगवते वासुदेवाय नमः', 'श्री कृष्ण शरणम ममः' आदि। यह सब गुरुओं के मंत्र है। इन सबका एक ही मतलब, 'हे भगवान आपको नमस्कार है।" अथवा 'हे भगवान मैं आपकी शरण में हूँ।' यही मंत्र का जाप शिष्य करता है। अतएव प्रश्न यह उठता है कि, 'अगर हम हिंदी, अंग्रेजी, बंगाली आदि भाषाओं में कहेंगे तो क्या भगवान नहीं सुने गए। भगवान भी भाषा वादी है क्या, संस्कृत में बोलेंगे तब मैं (भगवान) सुनुगा?' नहीं! वो तो "भावग्राही जनार्दन" है। भगवान भावना (प्रेम) देखते है। इसलिए यह जो गुरु मंत्र अथवा दीक्षा है, यह केवल संस्कृत में बोलना या लेने वाली बात गलत है। आपलोग अपने गुरु से पूछे ये क्या दे रहे है, गुरु मंत्र अथवा दीक्षा? गुरु: मंत्र आप: कैसा मंत्र। गुरु: भगवान का नाम। आप: भगवान का नाम तो भारत के सब लोग जानते है। यहाँ पर तो मरने के बाद नारा लगता है, 'राम नाम सत्य है।' यह सबको पता है, फिर आप मेरे कान में क्या दे रहे है। गुरु: देखों इस मंत्र में अलौकिक शक्ति है। यह हमरे गुरु जी के गुरु जी के गुरु जी का है। आप: तो वो जो अलौकिक शक्ति आपके बातये नाम में है। क्या वो अलौकिक शक्ति राम श्याम में नहीं है? अगर आपके द्वारा दियेगये कान के मंत्र को न जपते हुए, हम 'हरे राम हरे राम' जपे 'गोविन्द जय जय गोपाल जय जय' बोले तो क्या उसमें वो अलौकिक शक्ति नहीं है। अब गुरु जी को चुप रहना पड़ेगा। क्योंकि शास्त्र वेद कहते है कि, "नाम्नामकारि बहुधा निज सर्वशक्तिसुतखार्पिला नियमित: स्मरणे न काल:" अर्थात प्रत्येक भगवन नाम में भगवान स्वयं बैठे है और उनकी प्रत्येक (सभी) शक्तियाँ निहित (बैठी) है। अस्तु, अगर गुरु जी फिर भी कहे: और सभी भगवन नाम में शक्तियां नहीं होती जो गुरु के दिए हुए नाम में होती है। आप: ठीक है, गुरु जी आप दीजिये हमारे कान में मंत्र। और अगर हमारे कान में दिए हुए मंत्र का प्रभाव तुरंत नहीं हुआ। तो फिर १० चप्पल लगाएंगे आप पर। आपको यह बात सिद्ध करना पड़ेगा कि, 'आपके गुरु के गुरु के गुरु द्वारा दिए गए भगवन नाम अलौकिक शक्ति है, जैसे ही तुम्हारे कान में पड़ेगा वैसे ही उस अलौकिक शक्तियों का अनुभव होगा।' अब गुरू जी या तो भाग जाएंगे या तो आपसे क्षमा मगे गए। अतएव ये लोग गुरु नहीं है, ये पाखंडी है। अब समझिये यह गुरु मंत्र अथवा दीक्षा क्या है। यह दीक्षा को कोई अलौकिक शक्ति कहता है, तो कोई दिव्य आनंद और कोई दिव्य प्रेम आनंद कहता है। यदपि यह सब एक ही है। दीक्षा देना का मतलब अलौकिक शक्ति देना भी है, दिव्य प्रेम देना भी है और दिव्य आनंद देना भी है। तो अब प्रश्न है कि, 'दीक्षा कब मिलती है?' इस प्रश्न के उत्तर के लिए पढ़े ❛गुरु मंत्र अथवा दीक्षा कब मिलती है?❜ अवश्य पढ़े ❛क्या करे अगर हमारा गुरु वास्तविक गुरु नहीं है।❜ कर्म काण्ड गुरु ज्ञान काण्ड भक्ति / उपासना काण्ड You Might Also Like सामवेद यह गेय ग्रन्थ है। इसमें गान विद्या का भण्डार है, यह भारतीय संगीत का मूल है। ऋचाओं के गायन को ही साम कहते हैं। इसकी १००१ शाखाएं थीं। परन्तु आजकल तीन ही प्रचलित हैं - कोथुमीय, जैमिनीय और राणायनीय। इसको पूर्वार्चिक और उत्तरार्चिक में बांटा गया है। पूर्वार्चिक में चार काण्ड हैं - आग्नेय काण्ड, ऐन्द्र काण्ड, पवमान काण्ड और आरण्य काण्ड। चारों काण्डों में कुल ६४० मंत्र हैं। फिर महानाम्न्यार्चिक के १० मंत्र हैं। इस प्रकार पूर्वार्चिक में कुल ६५० मंत्र हैं। छः प्रपाठक हैं। उत्तरार्चिक को २१ अध्यायों में बांटा गया। नौ प्रपाठक हैं। इसमें कुल १२२५ मंत्र हैं। इस प्रकार सामवेद में कुल १८७५ मंत्र हैं। इसमें अधिकतर मंत्र ❛ऋग्वेद❜ से लिए गए हैं। इसे उपासना का प्रवर्तक भी कहा जा सकता है। प्राचीन आर्यों द्वारा साम-गान किया जाता था। सामवेद चारों वेदों में आकार की दृष्टि से सबसे छोटा है और इसके १८७५ मन्त्रों में से ६९ को छोड़ कर सभी ऋगवेद के हैं। केवल १७ मन्त्र अथर्ववेद और यजुर्वेद के पाये जाते हैं। फ़िर भी इसकी प्रतिष्ठा सर्वाधिक है, जिसका एक कारण गीता में कृष्ण द्वारा वेदानां सामवेदोऽस्मि कहना भी है।… … KEEP READING मनुष्य कितने दुखों से पीड़ित है? सबसे बड़ा दुःख? वेद में ताप को दुःख भी कहा जाता है। विश्व का प्रतेक जीव (व्यक्ति) दुखी है। तीन प्रकार के तापो (दुखों) से तप रहा है। आध्यात्मिक (दैहिक), आधिभौतिक (भौतिक) और आधिदैविक (दैविक) केवल यह तीन प्रकार के ताप (दु:ख) हैं संसार के सभी जीवों (मनुष्यों) को। यही ताप प्रेरक छण और प्रेरक जीवों (माया के अधीन मनुष्य) को दुःखमय बनाये हुए हैं। इन तीनों में सबसे प्रमुख है आध्यात्मिक ताप जिसे दैहिक दुःख भी कहते है। आध्यात्मिक (दैहिक) आध्यात्मिक दुःख भी दो प्रकर का होता है:- १. शारीरक और २. मानसिक। इन दोनों में मानसिक ताप (दुख) सबसे बड़ा दुखदाई है। १.शारीरक ताप जो शरीर की रोग है, यह शारीरक ताप (दुःख) कहलाती है। आप जानते ही है। आज बुखार है, तो कलअतिसार (डायरिया) है, आज ब्लड प्रेशर बढ़ गया तो कल डाइबटीज हो गया। इतनी जटिल शरीर की बनावट है की कोई न कोई भाग गड़बड़ रहता ही है। फिर मनुष्य भी असावधान है विषयों का लोलुप (लालची) है, कोईसंयम से आहार विहार व्यवहार नहीं रहता। इसलिए सदा प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी रोग से ग्रस्त (पीड़ित) हैं। और अगर मान लो कोई करोड़ों में कोई एक ऐसा व्यक्ति भी हो। तो मानसिक रोग से तो सब के … … KEEP READING आयुर्वेद आयुर्वेद (आयुः + वेद = आयुर्वेद) विश्व की प्राचीनतम चिकित्सा प्रणालियों में से एक है। यह ऋग्वेद का उपवेद है। यह विज्ञान, कला और दर्शन का मिश्रण है। ‘आयुर्वेद’ नाम का अर्थ है, ‘जीवन का ज्ञान’ और यही संक्षेप में आयुर्वेद का सार है। हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम्। मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते॥ -(चरक संहिता १/४०) (अर्थात जिस ग्रंथ में - हित आयु (जीवन के अनुकूल), अहित आयु' (जीवन के प्रतिकूल), सुख आयु (स्वस्थ जीवन), एवं दुःखआयु (रोग अवस्था) - इनका वर्णन हो उसे आयुर्वेद कहते हैं।) आयुर्वेद और आयुर्विज्ञान दोनों ही चिकित्साशास्त्र हैं परन्तु व्यवहार में चिकित्साशास्त्र के प्राचीन भारतीय ढंग को आयुर्वेद कहते हैं और ऐलोपैथिक प्रणाली (जनता की भाषा में 'डाक्टरी') को आयुर्विज्ञान का नाम दिया जाता है। आयुर्वेद का परिभाषा एवं व्याख्या आयुर्वेद विश्व में विद्यमान वह साहित्य है, जिसके अध्ययन पश्चात हम अपने ही जीवन शैली का विश्लेषण कर सकते है। (1) आयुर्वेदयति बोधयति इति आयुर्वेदः। अर्थात जो शास्त्र (विज्ञान) आयु (जीवन) का ज्ञान कराता है उसे आयुर्वेद कहते हैं। (2) स्वस्थ… … KEEP READING क्या राम और कृष्ण एक ही हैं? भगवान के अवतारों में भेद-भाव करना ये ❛नामापराध❜ हैं। और ❛नामापराध❜ से बड़ा कोई पाप नहीं हुआ करता। भगवान के जितने भी अवतार है उनमे भेद-भाव करना अपराध हैं। भगवान के किसी भी अवतार में भेद बुद्धि नहीं लगनी चाहिए और खास तोर से राम-कृष्ण अवतार में। और सभी अवतार में तो शरीर का अंतर हैं, देखने मे! जैसे नरसिंह अवतार, वराह अवतार, मत्स्य अवतार। लेकिन! राम कृष्ण में तो शरीर में भी भेद नहीं हैं। अध्यात्म रामायण में ब्रह्मा ने कहा था "मायातीतं माधवमाद्यं जगदािदं"हे राम तुम माया तित(माया से परे), मायाधीश हो और तुम माधव हो। ब्रह्मा माधव कह रहे है। अरे ब्रह्मा जी! आप की बुद्धि ख़राब है क्या? ब्रह्मा जी ये तो राघव है, माधव तो द्वापर में अवतार लेके आये थे। फिर ब्रह्मा बोले अध्यात्म रामायण "वन्दे रामं मरकतवर्णं"हे राम, मै आपको प्रणाम करता हूँ, जो मरकतवर्णं के आप हैं। मरकतवर्णं अर्थः मथुरा के धीश। अब सोचों मथुरा से क्या मतलब है राम का? राम तो मथुरा गये ही नहीं, रामाअवतार में। और ये भी सुनो अध्यात्म रामायण "वृन्दारण्ये वन्दितवृन्दारकवृन्दं" वृंदावन में रहने वाले मेरे राम। ध्… … KEEP READING वेद का विभाजन वेद के चार भाग क्यों हुआ ऋषि कृष्ण द्वैपायन भगवान के अवतार है। श्रीकृष्ण का जन्म द्वापर में हुआ और ऋषि कृष्ण द्वैपायन जी भी द्वापर में हुए इन्हे आज वेदव्यास जी के नाम से जाना जाता है। द्वापर युग के अंत में जब कलियुग का प्रारम्भ हो रहा था, तब एक समस्या उत्पन्य होने लगी। क्योंकि वेद एक था और पहले एक वेद के सम्पूर्ण ज्ञान को एक व्यक्ति याद रख लेता था परन्तु कलियुग के मनुष्य को सम्पूर्ण वेद का ज्ञान याद करना संभव नहीं था। इसलिए उस वक के ऋषि मुनियों ने वेद के विभाजन करने की इच्छा की। परन्तु वेद का विभाजन करना इतना सरल नहीं हैं। फिर वेद का विभाजन कौन करें, तो फिर वेदव्यास जी को चुना गया। क्योंकि वेदव्यास जी के बुद्धि की तुलना उस वक्त कोई और नहीं कर सकता था। और वेदव्यास वेद के दो विरोधी मंत्रो का समाधान करते थे। इसलिए ऋषि कृष्ण द्वैपायन अर्थात वेदव्यास जी ने उस समय के ऋषिओं के आज्ञा से वेद का चार भाग किया। वेद के चार भाग हैं यह वेद चार भागों में विभाजित हुए १. ❛ऋग्वेद❜ २.यजुर्वेद ३. ❛सामवेद❜ ४. ❛अथर्ववेद❜ सृष्टि के प्रारंभ में वेद अविभक्त तथा एक लाख मंत्र वाला था। अठाइसवें द्वापर में वेदव्य… … KEEP READING धर्म क्या है? धर्म के प्रकार? परधर्म व अपरधर्म क्या है? धर्म का अर्थ होता है "धारण करना" या "धारण करने योग" वेदों में दो प्रकार के धर्मों का वर्णन हैं, १.परधर्म २.अपरधर्म। अपरधर्म माने "वर्णाश्रम धर्म"  वर्णा माने, "ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र", और आश्रम मने, "ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास यह चार आश्रम हैं।"  जैसे ब्राह्मण क्या करे क्या ना करे, उसके बारे में वेदों में बहुत कुछ विस्तार से लिखा है, जैसे ब्राह्मण ब्रह्मचर्य में क्या करे क्या ना करे, फिर गृहस्थ में क्या करे क्या न करे, वानप्रस्थ और संन्यास  में क्या करे क्या न करे, वैसे ही क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र केलिए भी लिखा हैं। वेदों में वर्णाश्रम धर्म का बड़ा लंबा -चौड़ा उलेख है, अगर इस जन्म में कोई पढ़े और पालन करे, तो वो असंभव बात है। परधर्म का अर्थ संक्षेप में होता है भगवान(श्री कृष्ण, राम, संकर आदि) की भक्ति। लेकिन परधर्म में कामना नहीं होती, यानि "हेतु के बिना" अर्थात अहेतुकी जो भक्ति होती है, वो परधर्म है। तोपरधर्म मतलब भगवान(श्री कृष्ण, राम, संकर आदि) उनका नाम, उनका रूप, उनकी लीला, उनके गुण, उनके धाम, उनके … … KEEP READING यजुर्वेद यजुर्वेद हिन्दू धर्म का एक महत्त्वपूर्ण श्रुति धर्मग्रन्थ और चार वेदों में से एक है। इसमें यज्ञ की असल प्रक्रिया के लिये गद्य और पद्य मन्त्र हैं। ये हिन्दू धर्म के चार पवित्रतम प्रमुख ग्रन्थों में से एक है और अक्सर ऋग्वेद के बाद दूसरा वेद माना जाता है - इसमें ऋग्वेद के ६६३ मंत्र पाए जाते हैं। फिर भी इसे ऋग्वेद से अलग माना जाता है क्योंकि यजुर्वेद मुख्य रूप से एक गद्यात्मक ग्रन्थ है। यज्ञ में कहे जाने वाले गद्यात्मक मन्त्रों को ‘'यजुस’' कहा जाता है। यजुर्वेद के पद्यात्मक मन्त्र ॠग्वेद या अथर्ववेद से लिये गये है। इनमें स्वतन्त्र पद्यात्मक मन्त्र बहुत कम हैं। यजुर्वेद में दो शाखा हैं : दक्षिण भारत में प्रचलित कृष्ण यजुर्वेद और उत्तर भारत में प्रचलित शुक्ल यजुर्वेद शाखा। नाम और विषय यजुस के नाम पर ही वेद का नाम यजुस+वेद(=यजुर्वेद) शब्दों की संधि से बना है। यज् का अर्थ समर्पण से होता है। पदार्थ (जैसे ईंधन, घी, आदि), कर्म (सेवा, तर्पण ), श्राद्ध, योग, इंद्रिय निग्रह। इत्यादि के हवन को यजन यानि समर्पण की क्रिया कहा गया है। इस वेद में अधिकांशतः यज्ञों और हवनों के नियम और विधान हैं, … … KEEP READING भगवान से हमारा (जीव या आत्मा का) चार सम्बन्ध है। गीता ९.१८ "गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्।" अर्थात भगवान हमारे सबकुछ है। "त्वमेव माता च पिता त्वमेव...त्वमेव सर्वम् मम देव देव ॥" अर्थात भगवान ही हमारे सब कुछ है। सम्बन्ध का अर्थ, भगवान या संसार कौन हमारा सम्बन्धी है? इस लेख में हमने बताया कि हमारा सम्बन्ध केवल भगवान से ही है। भगवान से हमारा चार सम्बन्ध १. साजात्य सम्बन्ध … KEEP READING Terms Of Services Privacy Policy Disclaimer Copyright © 2016-17 Vedicaim.com All rights reserved

गुरु कौन है और कहाँ मिलेंगे 

गुरु कौन है और कहाँ मिलेंगे ? Jul 18, 2016 | लेख | जीव का वास्तविक स्वरूप यही है की वह श्रीकृष्ण का सनातन दास है– जीवेर स्वरूप हय कृष्णेर नित्य दास (चैतन्य चरितामृत)| जिनकी वाणी में जीव को उसके स्वरूप-धर्म (कृष्ण-दासत्व) में प्रतिष्ठित करने की गुरुता (क्षमता) है– वही ‘गुरु’ हैं| आध्यात्मिक जगत में प्रमुखतः चार प्रकार के गुरु माने जाते हैं– (१) दीक्षा-गुरु– जो वैदिक विधि से शिष्य को वैदिक मंत्र प्रदान करते हैं (२) शिक्षा-गुरु– जो सत्संग के द्वारा भक्ति का उपदेश प्रदान करते हैं (३) चैत्य-गुरु– सभी जीवों के ह्रदय में स्थित परमात्मा ही सब को अच्छे-बुरे का ज्ञान प्रदान करते हैं– वे ही सबके चैत्य-गुरु हैं| (४) पथ-प्रदर्शक गुरु– वे जो हमें यथार्थ गुरु का आश्रय दिलवाते हैं| गुरु कैसे होने चाहियें? चैतन्य चरितामृत में आता है– किब विप्र किब न्यासी शूद्र केने नय । जेइ कृष्ण तत्त्ववेत्ता सेइ गुरु हय ॥ चाहे कोई ब्राह्मण हो, संन्यासी हो, अथवा किसी ने शूद्रों के कुल में ही क्यों जन्म ग्रहण किया हो– किन्तु यदि वह व्यक्ति कृष्णतत्त्व के अनुभवी हैं तो वह मनुष्यमात्र के गुरु हैं| अपना उद्धार चाहने वाले सभी व्यक्ति चार वैष्णव सम्प्रदायों में से किसी एक में दीक्षा ले सकते हैं क्योंकि इन्हीं चार सम्प्रदायों में ही वैदिक ज्ञान तथा भक्ति अपने यथार्थ स्वरूप में प्रवाहित होती है– (१) ब्रह्म सम्प्रदाय (२) श्रीसंप्रदाय (३) रूद्र संप्रदाय (४) कुमार संप्रदाय इसी लिए गर्ग संहिता (१०/१६/२३-२६) में इस प्रकार का वर्णन आता है : वामनश्च विधि शेषः सनको विष्णुवाक्यतः| धर्मार्थ हेतवे चैते भविष्यन्ति द्विजः कलौ|| विष्णुस्वामी वामनान्षतथा मध्वस्तु ब्राह्मणः|| रामानुजस्तु शेषांश निम्बादित्य सनकस्य च| एते कलौ युगे भाव्यः सम्प्रदाय प्रवर्तकः| संवत्सरे विक्रम चत्वारः क्षिति पावन:|| सम्प्रदाय विहीना ये मंत्रास्ते निष्फल: स्मृत:| तस्माच्च गमनंह्यSस्ति सम्प्रदाय नरैरपि|| अर्थात – ‘ भगवान् वामन, ब्रह्मा जी, अनंत-शेष एवं सनकादी चार कुमार भगवान् विष्णु के आदेश से कलि युग में ब्राह्मणों के कुल में जन्म लेंगे| विष्णुस्वामी वामन के अंश से, मध्वाचार्य ब्रह्मा जी के अंश से, रामानुजाचार्य अनंत-शेष के अंश से एवं निम्बादित्य सनक के अंश से कलियुग में प्रकट हो चार वैष्णव-सम्प्रदायों के प्रवर्तक होंगे| यह सभी विक्रमी संवत के प्रारम्भ से ही चारों दिशाओं को पवित्र कर देंगे| कलियुग में जो मनुष्य इन चार वैष्णव-सम्प्रदायों में दीक्षा से विहीन होते हैं– उनके द्वारा जपे हुए मन्त्र इत्यादि सभी निष्फल होते हैं| अत: कलियुग में अपना कल्याण चाहने वाले सभी मनुष्यों को इन्हीं चार सम्प्रदायों में मन्त्र-दीक्षा ग्रहण करनी चाहिए|’ मध्यकाल में बंगाल को गौड़देश कहा जाता था| चैतन्य महाप्रभु तथा उनके अधिकांश पार्षदों नें गौड़देश में ही अवतार लिया| इसीलिये चैतन्य महाप्रभु की आराधना करने वालों को सामान्यत: गौड़ीय वैष्णव कहा जाता है| गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय ब्रह्म सम्प्रदाय के अंतर्गत आता है| प्रेषक: ISKCON Desire Tree-हिंदी hindi.iskcondesiretree.com facebook.com/IDesireTreeHindi SHARE: RATE: PREVIOUSविश्व मीडिया ने बड़े स्तर पर इस्कॉन के स्थापना दिवस को प्रसारित किया NEXTकरांची, पाकिस्तान में जगन्नाथ रथयात्रा ABOUT THE AUTHOR idtsevaks RELATED POSTS श्री बद्रीनाथ मंदिर, बद्रिकाश्रम, में हरिनाम उत्सव June 26, 2015 लोकनाथ गोस्वामी August 6, 2015 श्री रामानुजाचार्य जीवन चरित्र April 2, 2016 पुस्तक-वितरण के अनुभव November 30, 2016 LEAVE A REPLY Your email address will not be published. Required fields are marked * COMMENT Name * Email * Website POST COMMENT संस्थापक आचार्य WHATSAPP   दैनिक आध्यात्मिक लाभ के लिए हमारे WhatsApp नंबर से जुड़ें  +91 - 9987 94 94 94   आध्यात्मिक सलाह एवं प्रश्नों के लिए हमें ई-मेल करें idesiretree.hindi@gmail.com   आने वाली वैष्णव तिथियाँ ०५ अक्टूबर  श्री कृष्णा सरदिया रसयात्रा  लक्ष्मी पूजा  श्री मुरारी गुप्ता तिरोभाव आविर्भाव    ०६  ओक्टोबर  दामोदर मास की सुरुवात  चातुर्मास के चौथे महीने की सुरुवात    १० ओक्टोबर  श्रील नवरोत्तम दास ठाकुर तिरोभाव    १३ ओक्टोबर  राधाकुंड आविर्भाव  बहुला अष्टमी  वीरभद्र आविर्भाव      १५ ओक्टोबर  रमा एकादशी १९ ओक्टोबर  दीप दान, दीपावली, काली पूजा      २० ओक्टोबर   गोवर्धन पूजा ,गौ पूजा ,गौ क्रीड़ा  बलि दैत्यराज पूजा  रसिकानंद आविर्भाव    २१ ओक्टोबर  श्री वसुघोष तिरोभाव    २३ ओक्टोबर  श्रील प्रभुपाद तिरोभाव    हमारा फेसबुक पेज Iskcon Desire Tree - हिंदी Designed by Elegant Themes | Powered by WordPress